Anmol Fankaar: Dedicated to Talent of the World

Tamancha Jan of Lahore

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Written By Arunkumar Deshmukh


Admin’s Note: We are thankful for the permission to use material from We also greatfully acknowledge our other sources including writings by Pran Neville ji.

Tamancha Jan


While going from my house towards Juhu, there is a building at the corner of Gulmohar Circle which has a board-” Karachi Residents’ Association”. On enquiry I discovered that this was a building owned by Sindhi speaking Hindu and Muslim people, who had lived in Karachi before Partition. I was told that 5-6 such buildings exist all over Mumbai. On further enquiries, I was informed that there were a few buildings named ”Lahore Residents Association” in existence too! (Punjabi speaking Hindus and Muslims). When I met one of the residents of ”Lahore” wala building, that old gentleman was speaking so lovingly about old Lahore that I was surprised. Even after 65 years of Partition, these people had such fondness for Lahore…or Karachi, for that matter !!!

Lahore had played an important role in India’s film industry till Partition separated us. Lahore had a built in advantage that it was in the midst of a population who understood Hindi/Urdu well and it was a ready market for them. Bombay was far off and Calcutta and Madras catered mainly to regional aspirations. In the 40s, some really good films like Khazanchi, Khandan, Daasi etc were made in Lahore. All the three leading actors, Dilip, Raj and Dev had roots across the border. Shyam, Omprakash, Karan Dewan, Pran, Surendra, Balraj Sahni, Khursheed, Mumtaz Shanti, Veena, Begum Para, Noorjehan, Meena Shorey, Suraiya, Manorama, Kamini Kaushal, Shyama…. a string of artistes from Lahore enriched Indian films. Pancholi, Kardar, Rafi, Shamshad Begum, Jhande Khan, Ghulam Haider, Pt. Amarnath and brothers, Hansraj Behl, Khayyam, Vinod also came from the Lahore film industry.

( A separate article can be written about Lahore’s contribution to Bombay’s film industry).

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Singer Abhram Bhagat

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Written By

Arunkumar Deshmukh


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Singer Abhram Bhagat 

The role of music, dance and songs in the cultural life of India is as old as Civilisation. In olden times, kings and badshahs used to have court singers, court dancers and musicians and they supported many fine arts too.Thus Music not only had the Public support but also Royal Patronage.


No wonder then,that in every nook and corner of India, music, songs and dance had its variations thriving in each state, specific to its local culture. Carnatic music, Hindustani classical music, film music and non-film music had its own supporters.


Much before films started talking and singing, the non-film songs were popular in many forms. They could be classified in 3 categories,broadly-

1. Ghazals and related types

2.Bhajans and other devotional songs 

3. Geets.


Out of the above, ghazals and the related songs had a base of pure urdu. Hence, it was limited to a certain class of people who knew, appreciated or understood that language. Though, there have been ghazals in other languges like Gujrati, Punjabi and Sindhi, they have not been so common.


Bhajans and Geets had simpler grammars and were available in many local languages, so these type of songs being more common man friendly had a widespread acceptability.

As such, bhajans and religious songs were a part of our social life and Indian culture all over the country. As a result, many bhajan singers became quite famous. A large chunk of non-film songs consisted of Bhajans.Added to it were songs written by our various saints like Tulsidas, Meerabai, Soordas, Kabir, Tukaram, Namdeo, Ramdas and Thyagraja to name a few.

 Singer Abhram Bhagat

75 % of Indian public enjoyed Hindi bhajans and so the recording companies were always on the lookout for good bhajan singers. In the early 40s,50s and 60s many Gujarati, Rajasthani and Marathi bhajan singers became well known.


Today, we will learn about one such Gujrati Bhajan singer,who was famous not only in India, but also in USA, UK, Canada, African and European countries from 40s to 70s.


His name is ABHRAM BHAGAT.


Many senior readers,especially the Gujrati readers will certainly remember his name. Though Abhram Bhagat was internationally famous as bhajan singer, very few know that he was actually a Muslim ! And, he was a handicapped person, having lost one leg completely !!


I first heard his name in the early 50s. My father was a great Shiv Bhakt. We had a Big Shiv Mandir built in the open area surrounding our House. All of us were fond of Shiv bhajans. One day my father brought a new 78 RPM record,which was a Bhajan by Abhram Bhagat. We were all memsmerised with his clear pronunciation and his style of singing. From time to time the record shop used to send us any Abhram bhagat record they received. We did not know much about him, except that he was from Gujrat. Though in later years I left Hyderabad and was busy in career building, family raising etc, I used to recollect one particular Bhajan by Abhram Bhagat-" Haath chakra Trishool Sadashiv" always. I had all its Lyrics jotted down that time.


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रेकॉर्ड संग्रहकर्ता सुमन चौरसिया जी के साथ गजेन्द्र खन्ना की विशेष बातचीत

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रेकॉर्ड संग्रहकर्ता सुमन चौरसिया जी के साथ साक्षात्कार

-       गजेन्द्र खन्ना

कुछ समय पहले सुमन जी के संग्रहालय को जब मैं देखने गया था तो वे मुम्बई में थे। उस दर्शन का ब्यौरा मैं पहले ही अपने लेख में कर चुका हूँ। हाल ही में जब मुझे दोबारा इन्दौर जाना था तो मैंने फिर उनसे सम्पर्क किया। किस्मत से वे इन्दौर में ही थे और मैं उनसे मिलने पहुँच गया। पहुँचने पर मुझे सीधा उनके परिवार ने ऊपर संग्रहालय में भेज दिया।

सुमनजी और गजेन्द्र संग्रहालय में

वहाँ सुमन जी के साथ मुझे चर्चा करते हुए विजय गावड़े जी एवं श्रीमती लिली डावर मिले। गावड़े जी संग्रहालय के अध्यक्ष हैं और इन्दौर के जाने माने संगीत प्रेमी हैं। संग्रहालय के कार्य में इनका विशेष सहयोग है। कई संगीत कार्यक्रमों में भी इनका बहुमूल्य सहयोग रहा है। लिली डावर जी गायिका हैं और इन्दौर वासी संजय स्पंदन के द्वारा किए गए कार्यक्रमों से जानते हैं। उन्होंने विभिन्न सभाग्रहों एवं शैक्षणिक संस्थानों में भी कार्यक्रम किए हैं। कबीर वाणी के लिए उन्हें विशेष प्रेम है जिसको ले कर इन्होंने न सिर्फ कई कार्यक्रम किए हैं पर उसे आज की शिक्षा से जोड़ते हुए एम.फिल. भी की है। दोनों से पुराने समय के गीतों एवं पुराने समय की गायिकाओं जैसे लता एवं गीता दत्त पर चर्चा हुई। लिली जी गीता पर एक कार्यक्रम करने का विचार बना रही हैं।

कुछ समय चर्चा के बाद दोनों ने विदा ली और सुमन जी से मैंने साक्षात्कार शुरु किया।

गजेन्द्र : सुमन जी, नमस्कार। आखिर हमारी मुलाकात हो ही गई।

सुमनजी: जी। मैं आपका संग्रहालय में स्वागत करता हूँ।

गजेन्द्र: आपने बहुत ही अच्छा संग्रहालय बनाया है। आपने अपना पहला रेकॉर्ड कब खरीदा था। अपने शौक के बारे में हमें बताईए।

सुमनजी: धन्यवाद। मैंने पहला रेकॉर्ड सम्भवत: 1969 के आस पास खरीदा था और धीरे धीरे मेरा शौक बढ़ता रहा। पिछले तीस से भी अधिक वर्षों में मैं देश के विभिन्न शहरों में घूम कर फिल्मी और गैर फिल्मी गीतों के रेकॉर्ड का संग्रह करता रहा हूँ। आंतरिक प्रेरणा और शौक के तहत मैंने इस ‘जुनून’ में करीब-करीब अपना सर्वस्व होम कर के एक विराट संग्रह खड़ा कर दिया है।

सुमनजी संगीतकार नीनू मजूमदार एवं उनकी पत्नी गायिका कौमुदी मुंशी को उनका रेकार्ड भेंट करते हुए

गजेन्द्र: कहाँ-कहाँ से रेकॉर्ड ले कर आए हैं आप?

सुमनजी: इन्दौर, मुम्बई के अलावा मैं कलकत्ता, दिल्ली, अलाहाबाद, लखनऊ, चंदीगढ़, जामनगर, राजकोट और वलसाड जैसी जगहों में जा कर रेकॉर्ड खरीदे हैं। इस तपस्या के चलते इस संग्रहालय में 28000 से ज़्यादा रेकॉर्ड मैं जमा कर पाया।

गजेन्द्र: इतने नाज़ुक रेकॉर्ड आप इतनी दूर-दूर से कैसे लाते थे?

सुमनजी: हाँ खासकर 78 आरपीएम रेकॉर्ड काफी नाज़ुक होते हैं। मैं इन्हें आम तौर पर तौलिए में लपेट कर सूतली से टाईट बाँध कर लाता था ताकि वह हिल न सकें। मैं कोशिश करता हूँ कि अच्छी हालत के रेकॉर्ड ही खरीदूँ। कोई बहुत ही दुर्लभ रेकॉर्ड ही मैं खराब हालत में लेता हूँ। इन्हें ध्यान से कवर में धूल मिट्टी से दूर रखना पड़ता है एवं मिट्टी के तेल से धो कर साफ रखा जाता है। इन्हें रखा भी खड़ा जाता है ताकि खराब न हो। जहाँ तक हो सके इन नियमों का पालन करने से रेकॉर्ड ठीक रहते हैं। हालाँकि समयाभाव से हमेशा ऐसा नहीं हो पाता पर इतने बड़े संग्रहालय की देख-रेख एक सतत कार्य है जो हमेशा जारी है।

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लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रेकार्ड संग्रहालय : श्री सुमन चौरसिया जी की बनाई राष्ट्रीय धरोहर

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लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रेकार्ड संग्रहालय : श्री सुमन चौरसिया जी की बनाई राष्ट्रीय धरोहर

-    गजेन्द्र खन्ना

भारत की विविध संस्कृति में मालवांचल का अपना अनूठा स्थान है। मालवा के लोक गीत, वहाँ की भाषा, अच्छा खान-पान, रहन-सहन, इतिहास और लोगों की सादगी जग विदित है। मालवाँचल की गोद में ही मौजूद है वह स्थान जिसे शब़-ए-मालवा का नाम दिया गया है। आज इसे मध्यप्रदेश के एक सांस्कृतिक, वाणिज्यिक एवं शैक्षणिक केन्द्र के रूप में भी जाना जाता है। इसे अहिल्यानगरी भी कहा जाता है अहिल्याबाई होल्कर जी के नाम पर जिन्होंने यहाँ सालों राज किया था। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ इन्दौर की।

इन्दौर ज़िले को इन सब कारणों के अलावा उसके संगीत को दी गई सेवाओं के लिए भी जाना जाता है। यदि बात हम शास्त्रीय संगीत की करें तो उस्ताद अमीर खान का नाम स्वत: ही ज़ुबान पर आ जाता है। अगस्त 15, 1912 के दिन इस महान गायक का जन्म उज्जैन में ही हुआ था। इनके पिता शाहमीर खान होल्कर राजाओं के दरबार में गायक थे और उनके दादा चंगे खान भी बहादुरशाह ज़फर के दरबार में गायक रह चुके थे। अमीर खान साहब को इन्दौर घराने के स्थापक के रूप में जाना जाता है। होल्कर दरबार में कई बड़े कलाकार मौजूद थे। नृत्य के लिए भी दरबार में विशेष स्थान था। राज-पाट खत्म होने के बाद भी सालों तक इन्दौर के बाम्बे बाज़ार में महफिलें हुआ करती थीं।

उस्ताद अमीर खान

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Same Name Confusions (Part 3)

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Written by Arunkumar Deshmukh

This is the III and the concluding part of this series. This does not mean that all such cases are discussed-in fact, far from it ! I think, I have not been able to discuss even half of them.


Some readers had expected that some debatable cases would be discussed and clarified in this series. But I was very clear on this. Controversy and Same Name Confusion are two different things. Controversies are NEVER solved, because, whatever the decision, one of the warring parties does not agree to it. This is more so, when the persons concerning the controversies are no more alive. i wanted to focus only on confusions arising out of common names, in which, invariably, injustice is done to the lesser known party - crediting his work to the more well known name-alike artiste.


Today's list consists mainly of such cases, where the same-name poor cousins of the well known same name artistes suffered heavily.

 The First case today is of MD N. DATTA AND MD   NARAYAN DUTTA.

 11. Actually, many people may not be even aware that any MD by the name of NARAYAN DUTTA existed,but  in reality he did and has contributed to Hindi Film Music to the best of opportunities that he got to do so. NARAYAN DUTTA, I feel , was one of those unlucky composers like,C.Arjun, Sailesh Mukherjee, Daan singh, Sardar Malik, Jamal Sen,Pardesi etc, who had enough talent but luck was not in their favour.


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