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लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रेकार्ड संग्रहालय : श्री सुमन चौरसिया जी की बनाई राष्ट्रीय धरोहर

Written by Gajendra
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लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रेकार्ड संग्रहालय : श्री सुमन चौरसिया जी की बनाई राष्ट्रीय धरोहर

-    गजेन्द्र खन्ना

भारत की विविध संस्कृति में मालवांचल का अपना अनूठा स्थान है। मालवा के लोक गीत, वहाँ की भाषा, अच्छा खान-पान, रहन-सहन, इतिहास और लोगों की सादगी जग विदित है। मालवाँचल की गोद में ही मौजूद है वह स्थान जिसे शब़-ए-मालवा का नाम दिया गया है। आज इसे मध्यप्रदेश के एक सांस्कृतिक, वाणिज्यिक एवं शैक्षणिक केन्द्र के रूप में भी जाना जाता है। इसे अहिल्यानगरी भी कहा जाता है अहिल्याबाई होल्कर जी के नाम पर जिन्होंने यहाँ सालों राज किया था। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ इन्दौर की।

इन्दौर ज़िले को इन सब कारणों के अलावा उसके संगीत को दी गई सेवाओं के लिए भी जाना जाता है। यदि बात हम शास्त्रीय संगीत की करें तो उस्ताद अमीर खान का नाम स्वत: ही ज़ुबान पर आ जाता है। अगस्त 15, 1912 के दिन इस महान गायक का जन्म उज्जैन में ही हुआ था। इनके पिता शाहमीर खान होल्कर राजाओं के दरबार में गायक थे और उनके दादा चंगे खान भी बहादुरशाह ज़फर के दरबार में गायक रह चुके थे। अमीर खान साहब को इन्दौर घराने के स्थापक के रूप में जाना जाता है। होल्कर दरबार में कई बड़े कलाकार मौजूद थे। नृत्य के लिए भी दरबार में विशेष स्थान था। राज-पाट खत्म होने के बाद भी सालों तक इन्दौर के बाम्बे बाज़ार में महफिलें हुआ करती थीं।

उस्ताद अमीर खान

इस क्षेत्र में नाटक मंडलियाँ भी अक्सर अपनी उपस्तिथि दर्ज कराती थीं। शायद एसे ही किसी कार्य के लिए 1929 में यहाँ आए थे यहाँ दीनानाथ जी। उनका मराठी नाटकों में इतना नाम था कि नाट्यसम्राट बाल गंधर्व ने एक मौके पर कहा था कि यदि वे उनके नाट्यशाला में आ जाएँ तो वे उनका स्वागत रुपए के सिक्कों के कालीन के साथ करेंगे (उस समय एक रुपया बहुत बड़ी चीज़ हुआ करता था)। वैसे तो उनके परिवार का उपनाम हार्दिकर था पर अपने मूलस्थान के नाम पर मंगेशकर अपना लिया था। यहीं पर एक बालिका का जन्म हुआ था जिसका नामकरण में नाम हेमा रखा गया था लेकिन कुछ वर्ष पहले बाल्यावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हुई अपनी बेटी के नाम लतिका से ही वे उसे बुलाने लगे। लतिका नाम इस तरह इस बालिका से जुड़ा और आगे चल कर इन्होंने लता मंगेशकर के नाम से गायन में अपना सिक्का जमाया। सुगम संगीत के संग इनका नाम सदा के लिए ही जुड़ गया है।

दीना नाथ मंगेशकर

सुगम संगीत के चाहने वालों की ज़ाहिर है इन्दौर में कोई कमी नहीं है। गणेशोत्सव के अवसर पर तो पंडालों में सब तरफ फिल्मी गानों की धुनें सुनी जा सकती हैं। मोहल्ले के बालक इनमें ज़ाहिर है नई फिल्मों के ही गीत बजाते हैं जिन्हें बुज़ुर्ग लोग कभी-कभी मज़ाक में शोर भी बुला लेते हैं। समय के साथ संगीत का बदलना लाज़मी है लेकिन पुराने गीतों की तासीर समय के साथ भी ज्यों की त्यों है। दुर्भाग्यवश इनमें से कई गीत दुर्लभ होते जा रहे हैं। यदि आप कभी रेडियो सुनें या किसी संगीत की दुकान में जाएँगे तो आप पाएँगे कि वही गिने चुने गीत बार-बार दिखते हैं।

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बीसवीं सदी के अधिकांश भाग में संगीत को सुनने का माध्यम सी डी या कैसेट नहीं थे। उस समय गीत ग्रामोफोन रेकार्डों के माध्यम से सुने जाते थे। शुरुआत में गीत 78 आरपीएम के रेकार्डों पर बजाए जाते थे। ये शेलैक नाम के नाज़ुक पदार्थ से बनते थे। इनके दोनों तरफ एक-एक गीत होता था एवं ये गीत लगभग तीन मिनट के होते थे। 1960 के आस पास एलपी रेकार्ड भी बाजार में आ गए थे जिनपर एक तरफ 4-5 गीत आ सकते थे। इन बीते दशकों के कई गीत सिर्फ रेकार्डों पर ही उपलब्द्ध थे। फिल्में तो वैसे ही कई लुप्त हो चुकी हैं। कई तो स्टूडियो में हुई आग में ध्वस्त हो चुकी हैं और कुछ और अन्य कारणों से जाती रहीं। उस समय के कई गीतों की निशानी आज बस बाकी बचे रेकार्ड ही हैं।

इन नाज़ुक रेकार्डों को बहुत ही सावधानी से रखने की आवश्यक्ता होती है। घरों में असावधानीवश न जाने कितने रेकार्ड जाते रहे होंगे। कई रेकार्ड कबाड़ियों के पास भी परवाह न किए जाने के कारण पहुँच गए। कई लोगों ने जगह की कमी के नाम पर रेकार्डों को जला या फेंक भी दिया।

सुमन जी संग्रहालय में (फोटो आभार: वरुण ग्रोवर)

हमारी लुप्त होती इस रेकार्ड रूपी धरोहर के रक्षक के रूप में कुछ गिने-चुने रेकार्डप्रेमियों के निजी संग्रह ही एक उम्मीद की किरण बन कर आए हैं। इनमें सबसे अग्रणी रेकार्डप्रेमियों में श्री सुमन चौरसिया का नाम इस क्षेत्र में रुचि रखने वालों द्वारा बहुत ही इज़्ज़त से लिया जाता है। सुमन जी इन्दौर के पिगडम्बर गाँव के वासी हैं। एक साधारण परिवार में जन्मे सुमन जी ने रेकार्डों के संग्रह में एक असाधारण कार्य को अंजाम किया है।

लता दीनानाथ मंगेशकर रेकॉर्ड संग्रहालय

 

 सुमन जी को बचपन से ही गीत सुनने का शौक था जिसने वक्त के साथ एक जुनून का रुप ले लिया। वे इन्दौर के रेलवे स्टेशन के उधर एक चाय की दुकान का संचालन जहाँ एक ओर करते थे वहीं दूसरी ओर अपनी आमदनी का अधिकांश हिस्सा रेकार्ड खरीदने पर कर दिया करते थे। सीमित साधनों की परवाह किए बगैर उन्होंने अपने इस शौक को पूरी मेहनत से सिंचित किया। पूरे देश का भ्रमण कर उन्होंने कई दुर्लभ रेकार्डों को न सिर्फ हासिल किया पर संजो के भी रखा। लता मंगेशकर के सभी प्रकार के गीतों में विशेष रुचि के चलते इन्होंने उनके रेकार्ड दूर-दूर से ढ़ूँढ़े। उनके लगभग सभी गीत उनके पास मौजूद हैं (एक अनुमान के अनुसार इनकी गिनती 6000 रेकार्डों से भी ज़्यादा है)। वर्ष 2008 में लता बाई के 82 वें जन्मदिन पर उन्होंने पिगडम्बर (जो इन्दौर के महू तेहसील के अन्तर्गत आता है) में ही “लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रेकार्ड संग्रहालय” की स्थापना की है जहाँ उनके एकत्रित किए सभी रेकार्ड जिनकी संख्या 28000 से भी अधिक है को उन्होंने प्रदर्शित किया है।

 

संग्रहालय का एक दृष्य

इस संग्रहालय की ख्याति दूर-2 तक आज फैल चुकी है। पिछले महीने जब मैं इन्दौर गया तो मुझे इस संग्रहालय देखने की बहुत इच्छा थी। उनसे संपर्क किया तो पाया कि वे रेकार्डों की खोज में मुम्बई गए हुए हैं। मेरे अनुरोध पर उन्होंने मेरा सम्पर्क अपने पुत्र अंकुश से करवाया और मैं इस संग्रहालय को देखने पहुँच गया। पिगडम्बर को आज दो ही चीज़ों के लिए जाना जाता है – एक भारतीय प्रबन्धन संस्थान की इन्दौर शाखा के लिए और दूसरा सुमनजी के इस संग्रहालय के लिए। यह इमारत जिस मार्ग पर मौजूद है उसे प्रशासन ने इस कार्य की सराहना स्वरूप “लता मंगेशकर मार्ग” का नाम दिया है।

संग्रहालय में ग्रामोफोन एवं बैनर

अंकुश मुझे आदरपूर्वक दूसरे माले पर ले गए जहाँ यह संग्रहालय मौजूद है। संग्रहालय का दृष्य देख कर कोई भी संगीतप्रेमी भाव-विभोर हो सकता है। एक तरफ एक बड़ा लता बाई की तस्वीर वाला पोस्टर है जिस पर लिखा है, “लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रेकार्ड लाइब्रेरी, पिगडम्बर आप सभी का स्वागत करता है”। लगभग 1600 स्कवेर फीट की लाइब्रेरी में चारों ओर खूबसूरती से रखे रेकार्ड देखे जा सकते हैं। रेकार्डों के साथ ही ऊपर लता बाई से सम्बन्धित कई चित्र देखे जा सकते हैं। एक कोने में भौंपू वाला ग्रामोफोन देखा जा सकता है और दूसरी तरफ कई कैसेट मौजूद हैं। कमरे के बीचों-बीच एक बालक बैठा था जो एक गैर-फिल्मी गीत बजा रहा था। अंकुश ने बताया कि वह उनका चचेरा भाई शुभम है। शुभम ने पूछने पर बताया कि वह हाई स्कूल की पढ़ाई कर रहे हैं। शुभम सुमनजी की गीतों की डिजिटाइज़ेशन में मदद करते हैं और आगे साउन्ड इन्जिनियर का कोर्स करना चाहते हैं।

संग्रहालय का एक दृष्य

दोनों ने विस्तार से हमें संग्रहालय के विभिन्न हिस्से दिखाए। रेकार्डों को बहुत ही सलीके से सुमन जी ने सजाया हुआ है। सबको कवरों में उन्हें धूल से बचाने के लिए रखा गया है। फिल्मी श्रेणी के रेकार्डों को फिल्म के नामों के हिसाब से बाँटा गया है। एक ही फिल्म के गीत एक साथ पाए जा सकते हैं। 78 आरपीएम, एल पी, ई पी सभी प्रकार के रेकार्ड यहाँ देखने को मिले। एक अन्य भाग में गैर-फिल्मी गीत भी मौजूद थे। लता बाई के गीतों के अलावा कई अन्य कलाकारों के गीत यहाँ मौजूद हैं। 1902 में जारी किए गए रेकार्ड तक यहाँ संग्रह किए गए हैं। हिन्दी रेकार्डों का ये भारत में सबसे बड़ा रेकार्ड संग्रहालय है जो शौकीन संगीतप्रेमियों के लिए एक तीर्थ जैसा ही है।

संग्रहालय में लगी विभिन्न फोटो

एक खाने में कई सौ टेप रखे हुए हैं। सुमन जी पहले सुनने के लिए रेकार्डों के गीत टेप पर डाल दिया करते थे। आजकल वे इन्हें कम्पयूटर में आने वाली पीढ़ियों के लिए डालने के कार्य में प्रयासरत हैं। रेकार्डों के नाज़ुक होने के कारण यह बहुत समझदारी भरा निर्णय है उनका। उनके हौंसले का नमूना ये संग्रहालय पहले ही हमारे सामने है। वे इस काम को भी ज़रुर जल्द पूरा कर लेंगे ऐसी मेरी शुभकामना है।

लता जी का लिखा शुभकामनापत्र

लता बाई ने भी सुमन जी के इस कार्य को सराहा है। उन्होंने जो चिट्ठी सुमन जी को संग्रहालय के लिए बधाई स्वरूप भेजी थी वह वहाँ फ्रेम कर के रखी हुई है। उस पर लता जी अपने पेडर रोड के बंगले के पते से लिखती हैं:-

इंदौर वासियों को मेरा नमस्कार।

मेरा जन्म इन्दौर शहर में हुआ है। कुछ वर्ष पहले मेरा इंदौर आना जाना बहुत रहता था। अब बहुत कम हुआ है।

आप लोगों ने “लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रेकार्ड लाइब्रेरी” के ज़रिए मेरे गीतों को संग्रहित किया है, उसके लिए मैं आपकी आभारी हूँ।

मुझे खुशी है कि मालवा के शास्त्रीय संगीत के महान कलाकार खाँ साहेब अमीर खाँ, जो मेरे भाई हृदयनाथ के गुरु थे, खाँ साहेब अमानत अली खाँ से 1946 में थोड़े अरसे के लिए सीखा है।

आपने लाएब्ररी का जो उपक्रम शुरु किया है, उसे बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ पेश करती हूँ।

धन्यवाद

- लता मंगेशकर

लता जी से मिलने का सुमन जी को कई बार सौभाग्य मिल चुका है। अन्य कलाकारों से ले कर आम आदमी इस उपक्रम की तारीफ करते नहीं थकते।

मुझे जानकर आश्चर्य हुआ कि सुमन जी ने हिन्दी ही नहीं, उर्दू, पंजाबी, बंगाली सहित कई भाषाओं के रेकार्ड भी संजो कर रखे हुए हैं। बीते समय के जाने माने गायकों जैसे शमशाद बेगम, गीता दत्त, लता, आशा, रफी, किशोर से ले कर बेगम अख्तर, बड़े गुलाम अली के साथ-2 कई वक्त की धूल में खोए राजकुमारी, दुर्रानी, मीना कपूर और अफज़ल लाहौरी जैसे नाम भी देखे जा सकते हैं।

कई ऐसे गीत सुमन जी ने संग्रह कर के रखे हैं जो रेकार्ड कम्पनी एच एम वी के पास भी नहीं हैं। वे भी कई बारी अपने गीत संग्रह निकालने के लिए सुमनजी की मदद ले चुके हैं। मेरे अनुरोध पर उन्होंने मुझे दुर्लभ रेकार्ड के उदाहरणार्थ फिल्म पिया घर आजा (1948) का रेकार्ड दिखाया जिसके लिए अभिनेत्री मीना कुमारी ने स्वयं गीत गाए थे। रेकार्ड के कवर पर लिखे हुए उनके नाम को आप चित्र में देख सकते हैं।

मीनाकुमारी का पिया घर आजा का रेकार्ड

रेकार्ड संग्रह के अलावा सुमन जी ने संगीत से सम्बन्धित कई अन्य चीज़ों में सहयोग दिया है। कई संगीत श्रोता कार्यक्रमों में बजाने के लिए गीत व जानकारी बाँट कर उन्होंने पुराने श्रोताओं को तो कृतार्थ किया ही है, नई पीढ़ी के सुनने वालों को भी अपनी ओर आकर्शित किया है। विभिन्न कलाकारों पर होने वाले कार्यक्रमों में भी उन्होंने सहयोग दिया है।

संग्रहालय का एक अन्य दृ्ष्य

एक और बड़ा कार्य जो सुमन जी ने किया है वो है पुस्तकें प्रकाशित करने का। अन्य संगीत प्रेमियों के सहयोग से उन्होंने कुछ पुस्तकों का प्रकाशन किया है। पहली पुस्तक जो आई थी वह थी “बाबुल तेरी सोन चिड़ईया” जिसमें लता बाई के गाए 80 गीतों की समीक्षा आर एस यादव “अजातशत्रु” जी ने बेहद खूबसूरत ढ़ंग से की है। इस किताब की बहुत कम प्रतियाँ ही अब उपलब्द्ध हैं इससे ही आप इसकी लोकप्रियता का अन्दाज़ा लगा सकते हैं। इसके आखिर में संगीत प्रेमियों की लम्बी लिस्ट से ही आप अन्दाज़ लगा सकते हैं कि सुमन जी की मेहनत के कारण कितने लोग इस शौक से जुड़ पाए हैं। इसी प्रकार की दूसरी पुस्तक “सदियों में एक आशा” भी अजातशत्रु जी ने लिखी और सुमन जी ने 2009 में प्रकाशित की जिसमें आशा भोंसले के गाए 177 चुनिंदा गीतों की समीक्षा की गई है। “लता और सफर के साथी” नाम की एक पुस्तक भी प्रकाशित की गई जिसमें लता बाई के साथियों का ज़िक्र है।

संग्रहालय का एक अन्य दृ्ष्य

एक अन्य नायाब पुस्तक जो उन्होंने 2012 में सिने शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित की है वह है श्रीराम ताम्रकर जी की लिखी “बीते कल के सितारे”। इस अद्भुत पुस्तक में हिन्दी सिनेमा की नींव रखने वाले कई सितारों की जानकारी दी गई है जिनमें गायक, गायिकाएँ, अभिनेता, अभिनेत्री, निर्देशक एवं निर्माता भी शामिल हैं। बहुत ही सरल भाषा में कई भूली प्रतिभाओं के बारे में पढ़ना एक अनूठा अनुभव है। कई कलाकारों के नाम तो मुझे पहली बार सुनने में आए इस पुस्तक से जैसे पंढरी बाई और नलिनी तरखुड। अन्त में एक परिशिष्ट में और भी कई भूले बिसरे कलाकारों की जानकारी कम उपलब्द्ध है जैसे बाबूलाल चौखानी, गुलाब, जिल्लो इत्यादि। यह पुस्तक बहुत अच्छा प्रयास है।

संग्रहालय का एक अन्य दृ्ष्य

कुछ महीने पहले सुमन जी ने अस्सी के दशक की हिन्दी फिल्म गीत कोश का भी प्रकाशन किया है। इसका संपादन एवं संचयन जगदीश पुरोहित एवं गुलाम कुरैशी जी ने किया है। ये पुस्तक इस दशक की सभी फिल्मों के प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्त्रोत साबित हुआ है। इसमें इन सालों में प्रदर्शित हुई लगभग सभी फिल्मों (1650+) के गीतों के गायकों, संगीतकारों एवं गीतकारों की सूची दी गई है। फिल्मों के रेकार्डों के नम्बर, निर्देशक, निर्माता एवं कलाकारों की जानकारी दी गई है। इस बड़े प्रयास के बाद अब “लता समग्र” नाम की एक पुस्तक पर भी वे कार्य कर रहे हैं।

डिजिटाइज़ेशन फसिलिटी

सुमन जी की मेहनत का फल देख कर दिल वाकई गद-गद हो गया। भगवान उनके प्रयासों को और अधिक मज़बूती एवं उन्नति प्रदान करे इस आशा के साथ हमने संग्रहालय और सुमन जी के परिवार से इजाज़त ली। यह संग्रहालय वास्तव में एक राष्ट्रीय धरोहर है।

दिसम्बर माह में मेरी सुमनजी से मुलाकात भी हुई। उनका लिया गया साक्षात्कार भी इसी साईट पर जल्द उपलब्द्ध होगा।

 

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