Nadira

Written by shishir krishna sharma
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नादिरा

...................................................................शिशिर कृष्ण शर्मा

Nadira

हिंदी सिनेमा के इतिहास में रूचि रखने वाले हरेक व्यक्ति की तरह मेरी भी दिली तमन्ना थी कि उस दौर के भूले-बिसरे फ़नकारों से मिलूं, उनके वर्तमान हालात के बारे में जानूं, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाऊं, और शायद इसलिए भी ये मायावी शहर हमेशा से मुझे अपनी तरफ़ आकर्षित करता आया था। और फिर एक रोज़ तमाम सुख-सुविधाओं और भरे-पूरे परिवार की सुरक्षा को पीछे छोड़कर मैं इस महानगर की जद्दोजहद भरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। आज जब पीछे मुड़कर इस शहर में गुज़ारे अपने इन सोलह बरसों को देखता हूं तो Rhonda Byrne की मशहूर क़िताब ‘द सीक्रेट’ का एक एक लफ़्ज़ सच महसूस होता है, जिसके मुताबिक़ आप शिद्दत से जो कुछ चाहते हैं, वो सब आपको देर-सवेर हासिल हो ही जाता है। मैं ख़ुशक़िस्मत था कि मुंबई में क़दम रखते ही मुझे धीरेंद्र अस्थाना जैसे मशहूर लेखक और पत्रकार का साथ मिला जिन्होंने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया और साप्ताहिक ‘सहारा समय’ के मुंबई ब्यूरो प्रमुख की कुर्सी सम्भालते ही ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ और ‘लोग’ जैसे स्तंभों की ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी। एक मक़सद हासिल हुआ तो मैं जुट पड़ा अपनी पसंदीदा काम में। गुमनामी के अंधेरों में खो चुके, गुज़रे ज़माने के अभिनेता-अभिनेत्रियों, संगीतकारों, लेखकों, निर्माता-निर्देशकों की तलाश में मैंने मुंबई के गली-कूंचे खंगाल डाले। इस प्रक्रिया में न्यूथिएटर्स कोलकाता की फ़िल्मों से करियर की शुरूआत करने वाली फ़नकारा और ‘आहें ना भरीं शिक़वे ना किए’ की सहगायिका कल्याणीबाई को माहिम की दरगाह वाली गली में तलाशा तो लता को प्लेबैक में ब्रेक देने वाले संगीतकार दत्ता डावजेकर मुझे अंधेरी के शास्त्रीनगर-लोखंडवाला में मिले। ‘हरे कांच की चूड़ियां’ की नायिका नयना साहू श्रीमती राव के रूप में चेम्बूर में मिलीं तो ‘कभी तन्हाईयों में यूं’ से अमर हो चुकीं गायिका मुबारक बेगम ग्रांटरोड – कांग्रेस हाऊस के रेड लाईट इलाक़े की गंदगी से बजबजाती गलियों के एक सीलन भरे मकान के बामुश्क़िल छह गुणा आठ फ़ुट के अंधेरे कमरे में। इस मुहिम में मेरी मुलाक़ात वनमाला, प्रमिला, मंजु, नलिनी जयवंत, बेगमपारा, मुनव्वर सुल्ताना, टुनटुन, निरूपा रॉय, कामिनी कौशल, पूर्णिमा, दुलारी, श्यामा, शशिकला, निम्मी, पीस कंवल, अनीता गुहा, अमीता, बेलाबोस, कुमकुम, शारदा, सुधा मल्होत्रा, सुमन कल्याणपुर, बाबूभाई मिस्त्री, सुबोध मुकर्जी, महीपाल, राजेन्द्रनाथ, पं.फ़ीरोज़ दस्तूर, बी.एम.व्यास, नौशाद, स्नेहल भाटकर, .पी.नैयर, सरदार मलिक, रवि और इन सबसे बढ़कर शमशाद बेगम से भी हुई, जो आज भी पवई के पॉश इलाक़े में अपनी बेटी-दामाद के साथ रहती हैं, और जिनके निधन की ग़लत ख़बरें 10 अगस्त 1998 के अख़बारों में छप चुकी थीं।

http://www.milligazette.com/Archives/2004/01-15Nov04-Print-Edition/011511200437.htm

इस मुहिम में कई बार मायूसी भी हाथ लगी जब लगातार कोशिशों के बावजूद ‘छोटी बहन’ ने हर बार यही कहा, ‘दीदी बाज़ार गयी हुई हैं’। ‘अब्दुलरहमनिया’ और ‘गुड़ की डली’ कहती रहीं, ‘मेमसाब घर पर नहीं हैं’। फ़ोन उठाने वालों ने ‘यमला जट्ट’ तक मुझे कभी पहुंचने ही नहीं दिया। 50 के दशक की बांग्ला और हिंदी फ़िल्मों की अभिनेत्री के बेटे ने पहली ही कोशिश में अगले दिन मिलने के लिए बुलाया लेकिन महज़ बीस मिनट बाद ही उन्होंने वापस फ़ोन किया और चीखते-चिल्लाते ‘घड़ी-घड़ी फ़ोन क्यों करते हो, कहा न, मम्मी किसी से नहीं मिलतीं’ कहते हुए मुझे ‘बाप रे बाप’ कहने पर मजबूर कर दिया। महज़ बीस मिनटों में हुए शीर्षासन और उस ‘घड़ी-घड़ी के फ़ोन’ का रहस्य आज तक मेरी समझ में नहीं आया है। उधर इंटरव्यू के नाम पर ‘बहूरानी’ कभी दांत के दर्द से परेशान मिलीं तो कभी कमर के। और हाल ही में जब साठ के दशक में कुल जमा चार गीत गाने वाली गायिका तक पहुंचने में कामयाबी मिली तो उनके नखरों, झूठ, चुगलखोरी की आदत और 70-75 बरस की उम्र में भी ‘नन्हे मुन्ने राही’ की सी बचकानी हरक़तों ने मुझे कान पकड़ लेने पर मजबूर कर दिया। अभिनेत्री नादिरा भी एक ऐसी ही मूडी कलाकार थीं जिनकी टालमटोल से तंग आकर मुझे उनका नाम भी अपनी लिस्ट में से हटा देना पड़ा था। लेकिन धीरेन्द्र जी के कहने पर क़रीब दो साल बाद नवंबर 2005 के आख़िरी हफ़्ते में मुझे एक बार फिर से उनसे सम्पर्क करना पड़ा क्योंकि ‘सहारा समय’ को दिलीप साहब से जुड़ी नादिरा की यादों पर एक आलेख की ज़रूरत थी। नादिरा ने फ़ोन उठाया और दिलीप साहब का नाम सुनते ही उनकी आवाज में उत्साह झलकने लगा।

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प्रस्तुत है फ़ोन पर हुई बातचीत के आधार पर तैयार किया गया वो आलेख –

(दिलीप साहब के जन्मदिवस 11 दिसम्बर पर विशेष)

मेरी नज़र में दिलीप कुमार - नादिरा

दिलीप साहब की तारीफ़ में कुछ कह पाना आसान नहीं है। इतना बड़ा क़द है उनका कि कहने के लिए अल्फ़ाज़ छोटे पड़ते हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूं कि मैंने अपने करियर का आग़ाज़ फ़िल्म ‘आन’ से किया, जिसके हीरो दिलीप साहब थे। उस वक़्त मेरी उम्र महज़ अठारह बरस की थी और तब तक मैंने सिर्फ़ एक ही फ़िल्म, दिलीप साहब की ही ‘अंदाज़’ देखी थी। लेकिन तब मैं इतनी छोटी थी कि न तो वो फ़िल्म मेरी समझ में आयी और न ही मैं दिलीप साहब को पहचान पायी थी। फ़िल्म ‘आन’ मिली तो लोगों से पता चला हीरो कोई दिलीप कुमार हैं जो बहुत बड़े आदमी हैं और जिनकी अदाकारी का सारा मुल्क़ दीवाना है। दिलीप साहब के बारे में सुन-सुनकर कुछ ऐसा ख़ौफ दिलो-दिमाग़ पर तारी हो गया था कि जब उन्हें पहली बार सेट पर देखा तो मेरी घिग्घी बंध गयी। डरी-घबरायी, लेकिन सम्मोहित सी मैं उन्हें देखती रही और सच तो ये है कि जितना उनके बारे में सुना था उससे कई गुना ज़्यादा पुरअसर और पुरकशिश उन्हें पाया। उनकी अदाकारी से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। मुश्किल से मुश्किल शॉट को भी वो इतनी ख़ूबसूरती और सहजता के साथ निभा ले जाते थे कि सेट पर मौजूद हरेक आदमी के मुंह से बेसाख़्ता ‘वाह’ निकल पड़ती थी। मैंने उन्हें देख-देखकर अदाकारी की बारीक़ियां ही नहीं बल्कि कैमरे और लाईट्स की तकनीक का अदाकारी की बेहतरी में इस्तेमाल करना भी सीखा। दिलीप साहब की नज़र में मैं अंग्रेज़ीदां यहूदी ख़ानदान से आयी एक छोटी बच्ची थी जिसका हिंदी-उर्दू से दूर-दूर का वास्ता नहीं था। उन्होंने बेहद इज़्ज़त और दिलचस्पी के साथ मुझे अल्फ़ाज़ का सही उच्चारण करना और संवाद अदायगी की ज़रूरियात के बारे में समझाया। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि दिलीप साहब ने ही फ़िल्मों में पारसी थिएटर की लाऊडनेस की जगह सहज अदाकारी और अंडरप्ले का आग़ाज़ किया। वो अपनेआप में अदाकारी का भरा-पूरा तालीमगाह हैं। निजी तौर पर मुझे उनके विराट व्यक्तित्व की तुलना में उनकी आवाज़ हमेशा थोड़ी कमज़ोर महसूस हुई। लेकिन अपनी ख़ूबसूरत और दिलकश संवाद अदायगी के जादू से उन्होंने उस कमज़ोरी को भी अपनी ताक़त बना लिया। परदे पर ही नहीं आम ज़िंदगी में भी दिलीप साहब जैसा ज़हीन और भाषा पर पकड़ रखने वाला कोई और अदाकार मैंने आज तक नहीं देखा। जिस ख़ूबसूरती और ठहराव के साथ एक-एक लफ़्ज़ वो बोलते हैं, वो सुनने वालों को सम्मोहित कर देता है। दिलीप साहब बेहद संतुलित व्यक्तित्व के मालिक हैं। वो जानते हैं कहां, किसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए। वो एक अच्छे अदाकार ही नहीं एक नेक इंसान भी हैं। लोगों के दुखदर्द को देखकर भावुक होते मैंने उन्हें कई बार देखा है। गुमनाम रहकर ख़ामोशी के साथ ज़रूरतमंद लोगों की मदद करने में उन्हें सुकून मिलता है। ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जब दिलीप साहब ने दीन-दुखियों की भरपूर मदद की लेकिन ख़ुद को उनकी नज़रों से छुपाए रखा। उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत जो मैंने देखी, वो ये कि उनकी भरसक कोशिश रहती है कि उनके क़द के आगे कभी भी कोई ख़ुद को बेचारगी की हद तक बौना महसूस न करे। छोटा हो या बड़ा, सबके साथ वो बेहद इज़्ज़त से पेश आते हैं। वो इज़्ज़त देकर इज़्ज़त कराना जानते हैं। मैं गवाह हूं इस बात की, जो उम्र में भी और तजुर्बे में भी उनसे बहुत छोटी थी। लेकिन दिलीप साहब ने आत्मीयता भरे व्यवहार से मेरे दिलोदिमाग़ में समाए ख़ौफ़ को तो दूर किया ही, मेरे अंदर हिम्मत और जोशोख़रोश भी पैदा किया। ये उन्हीं का दिखाया रास्ता है जिस पर चलकर मैंने एक अच्छी अदाकारा के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। मैं इसके लिए दिलीप साहब की शुक्रगुज़ार हूं और हमेशा रहूंगी।                (शिशिर कृष्ण शर्मा से बातचीत के आधार पर)

(साप्ताहिक सहारा समय दिनांक 17 दिसम्बर 2005 में प्रकाशित)

Nadira

नादिरा से बात करने का मेरा ये अनुभव पहले के अनुभवों के ठीक विपरीत था। इस बार उनके व्यवहार में ख़ासी गर्मजोशी थी। बातचीत के दौरान जब उन्होंने मेरे बारे में और ज़्यादा जानना चाहा तो मैंने भी मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए उन्हें दो साल पहले के उनके बर्ताव की याद दिलाने की कोशिश की। मैंने उन्हें बताया कि लगातार तीन चार महिने की टालमटोल के बाद उन्होंने एक रोज़ किस तरह से मेरी पूरी बात सुने बिना ही फ़ोन पटक दिया था। सुनते ही उनके मुंह से निकला, “ओह गॉड, मैं ऐसी ग़लीज़ हरक़त कैसे कर सकती हूं!”...और अगले ही पल उन्होंने मुझे अपने घर आने का न्यौता दे दिया।...और दो ही रोज़ बाद मैं उनके घर पर था।

प्रस्तुत है दिनांक 15 जनवरी 2006 के दैनिक राष्ट्रीय सहारा के ‘संडे उमंग’ में प्रकाशित उनका वो इण्टरव्यू –

मुड़ मुड़ के न देख - नादिरा                        

..............शिशिर कृष्ण शर्मा  

महबूब की फ़िल्म ‘आन’ (1952) से फ़िल्मों में क़दम रखने वाली, यहूदी परिवार की फ़रहत ख़ातून एज़िकल को नादिरा नाम भी महबूब ने ही दिया था। नादिरा के तेज़-तर्रार व्यक्तित्व, प्रखर आवाज़ और ग़ज़ब के अभिनय ने इस पहली ही फ़िल्म से सिर्फ़ अठारह साल की उम्र में उन्हें स्टार बना दिया था। नायिका, खलनायिका और चरित्र अभिनेत्री के रूप में करीब चार दशकों तक वो दर्शकों के दिलोदिमाग़ पर छाई रहीं। उस दौरान क़रीब 80 फ़िल्मों में उन्होंने अभिनय किया और फिर बढ़ती उम्र और बिगड़ती सेहत की वजह से वो चुपचाप फ़िल्मोद्योग से अलग हो गयीं। साईटिका और रीढ़ की लाइलाज बीमारी की वजह से पिछले तीन बरसों से वो बिस्तर पर लेटे रहने को मजबूर थीं। बाहरी दुनिया से उनका सम्पर्क लगभग कट चुका था और अपने चरित्र के मुताबिक़ फ़िल्मोद्योग भी उन्हें भुला चुका था। वोही नादिरा पिछले दिनों अचानक एक बार फिर सुर्खियों में आयीं जब देश के सभी प्रमुख अख़बारों और टेलिविज़न चैनलों ने दिल के दौरे के बाद उनके अस्पताल में भरती होने की ख़बरें प्रकाशित-प्रसारित कीं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नादिरा दक्षिण मुंबई के भाटिया अस्पताल में आई.सी.यू. में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं। पिछले कई वर्षों से मीडिया का भी उन तक पहुंचना दूभर था लेकिन हमारी लगातार कोशिशों के बाद अंतत: उन्हें अपनी ज़िद छोड़नी ही पड़ी।

तारीख़ 1 दिसंबर 2005। दक्षिण मुंबई के पैडर रोड और वार्डन रोड के जंक्शन पर स्थित बिल्डिंग ‘वसुंधरा’। अत्यंत सम्पन्न इलाक़ा जहां आसपास लता, आशा, आनन्दजी और सितारादेवी जैसी फिल्मी हस्तियां रहती हैं। इन पंक्तियों का लेखक तय समय पर शाम के ठीक 6 बजे नादिरा के फ़्लैट नंबर 29 के दरवाज़े पर था। दरवाज़ा जिस महिला ने खोला वो पिछले छह सालों से नादिरा की देखभाल कर रही हैं। अत्यंत सुरूचिपूर्ण तरीक़े से सजा विशाल फ़्लैट। बरसों पुराना बेहद ख़ूबसूरत फ़र्नीचर। ड्रॉईंगरूम में देसी-विदेशी भाषाओं की सैकड़ों क़िताबों का संग्रह। और बेडरूम में बिस्तर पर लेटीं नादिरा। बातचीत का सिलसिला शुरू होते ही अहसास होने लगा कि वृद्धावस्था और तक़लीफ़देह बीमारियां अपने वक़्त की इस बेमिसाल अदाकारा की आवाज़ की प्रखरता और सहज हास्यबोध पर कोई असर नहीं डाल पायी हैं। क़रीब एक घण्टे के रेकॉर्डेड इंटरव्यू में हंसी-मज़ाक़ के साथ हल्की-फ़ुल्की चुटकियां लेते हुए उन्होंने अपने जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं पर बेलाग बातचीत की। लेकिन अचानक माहौल तब बेहद ग़मगीन हो उठा जब उनसे पूछा गया, अपना वक़्त आप कैसे गुज़ारती हैं? ये न पूछो तो ही अच्छा है...वक़्त नहीं कटता...तन्हाई बहुत तंग करती है...कम्बख़्त नींद भी तो नहीं आती...रात रात भर तड़पती हूं...कभी लाईट ऑन करती हूं, कभी ऑफ़ करती हूं...’ कहते कहते उनका गला रूंध गया था। पलकें भींचकर वो अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करने लगीं। कमरे में अजीब सा सन्नाटा पसर गया था। वाकई तन्हाई शायद नादिरा की क़िस्मत में ही लिखी थी। दोनों भाईयों समेत सभी नाते-रिश्तेदार बरसों पहले इज़राईल जा बसे थे। नादिरा ने दो विवाह किए लेकिन दोनों बामुश्क़िल दो-दो साल तक ही चल पाए। उनका पहला विवाह फ़िल्म ‘महल’ का ‘आएगा आने वाला’ जैसा हिट गीत लिखने वाले गीतकार नक़्शब से हुआ था। बक़ौल नादिरा, मैं ही क्या, कोई भी ख़ुद्दार औरत उनकी रंगीनमिज़ाजी को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी। मेरी मौजूदगी में ही जब वो ग़ैरऔरतों को घर में लाने लगे तो एक रोज़ मैंने सिर्फ़ तन पर पहने कपड़ों के साथ उनका घर छोड़ दिया।‘

नादिरा का दूसरा विवाह अरब मूल के एक ग़ैरफ़िल्मी व्यक्ति से हुआ था, जो उनके मुताबिक़ निहायत कामचोर क़िस्म के व्यक्ति थे। इस विषय में नादिरा का कहना था, एक आम औरत की तरह शौहर को लेकर मेरी भी कुछ तमन्नाएं थीं। निकम्मे मर्द को पालना मेरे लिए मुमक़िन नहीं था इसलिए जल्द ही मुझे उनसे भी अलग होना पड़ा।‘ नक़्शब बाद में पाकिस्तान चले गए और दूसरे शौहर अरब। बीते ज़माने की अदाकाराएं निम्मी, श्यामा और निरूपा रॉय नादिरा के काफ़ी क़रीब रहीं। श्यामा, जो खुद भी इन दिनों गंभीर रूप से बीमार चल रही हैं, कहती हैं, नादिरा की साफ़गोई मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है। पहले तो रोज ही हमारा मिलना-जुलना और गप्पें लड़ाना होता था लेकिन निरूपा के गुज़रने और हम दोनों ही की सेहत के बिगड़ने की वजह से ये रिश्ता अब बस कभी-कभार फ़ोन पर बतिया लेने तक का रह गया है।‘

निम्मी का आज भी नादिरा से मिलना-जुलना होता रहता है। वो कहती हैं, फ़िल्म ‘आन’ के वक़्त हुई हमारी दोस्ती आज भी बरक़रार है। पहले तो तकरीबन रोज़ ही हमारी मुलाक़ात होती थी लेकिन जब से मैं वरली से जुहू शिफ़्ट हुई, दूरियां बढ़ जाने की वजह से वो बात नहीं रही। इसके बावजूद फ़ोन पर तो क़रीब-क़रीब रोज़ाना ही एकाध दफ़ा हमारी बातचीत हो जाती है। ख़ुदा से यही दुआ है कि नादिरा जल्द से जल्द ठीक होकर घर वापस आ जाए।‘

नादिरा के अकेलेपन का वो दर्द, वो तड़प किसी को भी रूला देने के लिए काफ़ी थे। उनकी मन:स्थिति को इसी बात से समझा जा सकता है, जो फ़िल्मोद्योग की विभिन्न ट्रेडयूनियनों से जुड़े वयोवृद्ध अभिनेता चन्द्रशेखर जी के अनुसार नादिरा अक्सर मज़ाक़ में कहती है, मेरे मरने का पता भी चार दिन बाद चलेगा जब मेरे फ़्लैट से बदबू आने लगेगी।‘

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जब नादिरा आई.सी.यू. से बाहर आयीं तो एक रोज़ मैं उनसे मिलने भाटिया अस्पताल पहुंचा। वो बिस्तर पर लेटी हुई शून्य में ताक रही थीं। पिछले कई सालों से उनकी देखभाल करती आयी महिला उनके साथ मौजूद थीं। उन्होंने नादिरा को मेरा परिचय देने की भरसक कोशिश की लेकिन नादिरा ख़ामोशी के साथ मुझे अजनबी सी निगाहों से घूरती रहीं। साफ़ पता चलता था कि दिमाग़ उनका साथ नहीं दे रहा है। उनका चेहरा सूजा और पथराया हुआ था और एक आंख भी सूजन की वजह से बंद थी। क़रीब बीस मिनट उनके साथ गुज़ार कर मैं भारी मन लिए वापस चला आया। 9 फ़रवरी 2006 की सुबह नादिरा के निधन की ख़बर मिली और साथ ही दैनिक जागरण से अजय ब्रह्मात्मज का फ़ोन आया कि जितना जल्द हो सके, इस विषय में एक आलेख तैयार करके भेजूं।

प्रस्तुत है दिनांक 12 फ़रवरी 2006 के दैनिक जागरण में प्रकाशित वो आलेख –

अंतत: तन्हाई से मिली निजात, नादिरा

आख़िरकार नादिरा मौत से हार ही गयीं। परदे की छवि के ठीक अनुरूप अपने तेज़तर्रार और जुझारू व्यक्तित्व के दम पर ही क़रीब डेढ़ महिने तक वो मौत से जूझती रहीं। नादिरा पिछले तीन वर्षों से दक्षिण मुंबई स्थित अपने विशाल फ़्लैट से बाहर नहीं निकली थीं। रीढ़ की बीमारी के चलते वो बिस्तर पर लेटे रहने को मजबूर थीं। समय के इस अंतराल में बाहरी दुनिया से उनका सम्पर्क लगभग कट सा चुका था। लेकिन वृद्धावस्था और तक़लीफ़देह बीमारियां भी उनके हास्यबोध, चेहरे के तेज और दमदार आवाज़ पर कोई प्रभाव नहीं डाल पायी थीं। बस सिर्फ़ एक अकेलापन था जो उन्हें हर लम्हा परेशान करता था। ‘बहुत उदास हो जाती हूं... तन्हाई बहुत तंग करती है...कभी कभी मुझे लगता है, किसी तरह ये वक़्त थम जाए, और सब कुछ रूक जाए...लेकिन बेबस हूं...और फिर कम्बख़्त नींद भी तो नहीं आती...रात रात भर तड़पती हूं...कभी लाईट ऑन करती हूं, कभी ऑफ़ करती हूं...’ ये कहते कहते उनका गला भर आया था। महबूब की फ़िल्म आन (1952) से फ़िल्मों में क़दम रखने वालीं, यहूदी परिवार में जन्मीं नादिरा घर में फ़रहत ख़ातून एजिकल, स्कूल में फ़्लोरेंस एजिकल और फ़िल्मों में नादिरा कहलायीं। अकेलापन शायद उनके नसीब में ही बदा था। दोनों भाईयों समेत उनके सभी क़रीबी रिश्तेदार बरसों पहले इज़रायल जा बसे थे। दो बार विवाह कर नादिरा ने अपने अकेलेपन को बांटने की कोशिश की भी तो असफलता ही हाथ आयी। पहला विवाह उन्होंने फ़िल्म ‘महल’ में ‘आएगा आने वाला’ जैसा अमर गीत लिखने वाले गीतकार नक़्शब से किया था। बतौर निर्माता नक़्शब ने फ़िल्म ‘नगमा’ (1953) बनायी और उसी दौरान नादिरा उनकी जीवनसंगिनी बन गयीं। लेकिन बामुश्क़िल दो ही बरसों में उन्हें अलग हो जाना पड़ा। नादिरा के मुताबिक़, शौहर की रंगीनमिज़ाजी को कोई भी औरत बर्दाश्त कैसे कर सकती है...मैंने कैसे घुटघुटकर वो वक़्त निकाला ये मेरा ख़ुदा ही जानता है...जब मेरी मौजूदगी में ही ग़ैरऔरतों का आना शुरू हो गया तो एक रोज़ मैं सिर्फ़ तन पर पहने कपड़ों के साथ उनके घर से निकल आयी।‘

नादिरा का दूसरा विवाह अरब मूल के एक ग़ैरफ़िल्मी व्यक्ति से हुआ था, लेकिन दूसरे शौहर के निठल्लेपन ने दो-ढाई साल के भीतर एक बार फिर से उन्हें अकेली हो जाने के लिए मजबूर कर दिया। कुछ वक़्त बाद नक़्शब पाकिस्तान चले गए और बक़ौल नादिरा, दूसरे शौहर आज भी सऊदी अरब में रहते हैं। 1 दिसंबर 2005 की शाम नादिरा के निवास पर हुए क़रीब एक घंटे के रेकॉर्डेड इंटरव्यू में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के तकरीबन हरेक पहलू पर मस्ती भरे अंदाज में चुटकियां लेते हुए बेबाक़ बातचीत की। उनके मन की कड़ुवाहट और बेबसी को इस बात से बख़ूबी समझा जा सकता था, वो सब मैंने करना छोड़ दिया है कि लोगों को बुलाओ...खिलाओ पिलाओ...सामने सब मीठी मीठी बातें करते हैं लेकिन जाने के बाद पलटकर फ़ोन भी नहीं करते...कोई ख़ुद आना चाहे तो सर माथे...लेकिन अब कोई आता भी तो नहीं...।’ सिर्फ़ बीते ज़माने की अदाकाराएं निम्मी, श्यामा, और (स्वर्गीया) निरूपा रॉय ही थीं जो हमेशा नादिरा के क़रीब रहीं। कुछ समय पहले तक इन चारों का लगभग रोज़ ही मिलना-जुलना, गप्पें लड़ाना और ताश खेलना होता था। लेकिन निरूपा रॉय के निधन, श्यामा की बिगड़ती सेहत और निम्मी के वरली से जुहू शिफ़्ट हो जाने की वजह से नादिरा फिर से अकेली रह गयी थीं। सिर्फ़ एक नौकरानी थी जो चौबीसों घण्टे उनकी देखभाल करती थी। या फिर बरसों पुराने एक दोस्त और प्रशंसक श्री रूंगटा जो आख़िरी वक़्त तक नादिरा के साथ रहे। 12 दिसंबर से नादिरा की तबीयत बिगड़नी शुरू हुई, 27 दिसंबर को उन्हें दक्षिण मुंबई के भाटिया अस्पताल में भरती कराया गया लेकिन हालात नहीं सम्भले तो 31 दिसंबर को आई.सी.यू. में शिफ़्ट कर दिया गया जहां से 17 जनवरी को वो बाहर आयीं। मेनेंजाईटिस के चलते आख़िरकार 9 फरवरी की सुबह अस्पताल में ही उन्होंने आख़िरी सांस ली और बीमारियों से ही नहीं, अकेलेपन से भी हमेशा के लिए छुटकारा पा लिया।          

प्रस्तुति : शिशिर कृष्ण शर्मा

 

9 फ़रवरी 2006 की दोपहर दक्षिण मुंबई के एक शवदाह गृह में श्री रूंगटा की देखरेख में, जन्म से यहूदी नादिरा का अंतिम संस्कार उनकी इच्छानुसार हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार कर दिया गया। और इसके साथ ही हिंदी सिनेमा के एक जगमगाते अध्याय का पटाक्षेप हो गया।

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