Lyricist Naqsh Lyallpuri In An Exclusive Interview For Anmol Fankaar with Shishir Krishna Sharma

Written by shishir krishna sharma
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नक़्श लायलपुरी

..................................................................................शिशिर कृष्ण शर्मा

Naqsh ji in a Function

नक़्श लायलपुरी नाम है उन शायर का जिन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में बतौर उत्कृष्ट गीतकार हमेशा याद किया जाता रहेगा। पिछले क़रीब पांच दशकों से हिन्दी और पंजाबी सिनेमा के गीत-संगीत को अपनी लेखनी से समृद्ध करते आ रहे नक़्श साहब ने बीती 24 फ़रवरी को जीवन के 84वें वर्ष में कदम रखा है। मुम्बई के ओशिवरा क्षेत्र में स्थित अपने निवासस्थान पर उन्होंने अनमोलफ़नकार.कॉम के लिए ख़ासतौर से समय निकाला और अपने निजी और व्यावसायिक जीवन के विषय में विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है नक़्श लायलपुरी साहब की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी :

During a Rehearsal of Tumhen Ho Na Ho (Gharonda) with Jaidev and Runa Laila

मेरा जन्म 24 फरवरी 1928 को अविभाजित भारत के पश्चिमी पंजाब स्थित लायलपुर ज़िले के गांव चक नम्बर 118 में हुआ था। पिता पॉवर हाऊस में इंजीनियर थे। दस महिने का हुआ कि मेरी मां गुज़र गयीं, जिसकी वजह से पिताजी को दूसरी शादी करनी पड़ी। चौथी तक की मेरी पढ़ाई गांव के ही प्राईमरी स्कूल में हुई। पिताजी का ट्रांसफ़र रावलपिण्डी हुआ तो पांचवी से आठवीं तक की पढ़ाई मैंने रावलपिण्डी में की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए लायलपुर शहर में हॉस्टल में दख़िला ले लिया। यही वो दौर था जिसने मेरे जीवन को एक नयी दिशा दी थी। दरअसल हमारे उर्दू के मास्टर रामलालजी मेरी लिखाई और लेखन शैली से इतने प्रभावित थे कि साल के आख़िर में मेरी कॉपियां अपने पास रख लेते थे ताकि बड़े छात्रों को दिखाकर उनके सामने उदाहरण रख सकें। उन्हीं की प्रेरणा से मेरा रूझान साहित्य की तरफ़ होने लगा था और मैं थोड़ा-बहुत लिखने भी लगा था। मास्टरजी का कहना था, अगर मैं विषय के रूप में साहित्य को चुनूं तो जीवन में काफ़ी आगे जाऊंगा। लेकिन पिताजी चाहते थे कि मैं भी उन्हीं की तरह इंजीनियर बनूं, इसलिए उनके कहने पर मजबूरन मुझे विज्ञान के विषय चुनने पड़े, हालांकि रूचि न होने के कारण मैं कभी भी विज्ञान की कक्षा में नहीं गया। नतीजतन 12वीं तो पास कर ली लेकिन विज्ञान में मुझे बेहद कम नंबर मिले। पिताजी को मुझे इंजीनियर बनाने का सपना टूटता सा नज़र आया तो वो मुझ पर बरस पड़े। उस रोज़ मैंने साफ़ शब्दों में उनसे कह दिया कि मेरी दिलचस्पी विज्ञान या इंजीनियरिंग में ज़रा भी नहीं है। इस बात पर और भी ज़्यादा नाराज़ होकर उन्होंने मुझे आगे पढ़ाने से साफ़ इंकार कर दिया। उस वाक़ये ने भले ही मजबूरी में सही, लेकिन मुझे एक रास्ता ज़रूर सुझाया और मैं लाहौर जाकर वहां से छपने वाले, हीरो पब्लिकेशन के उर्दू दैनिक रंजीत निगारा’ में नौकरी करने लगा। इस तरह से पत्रकारिता की मेरी शुरूआत हुई थी। लाहौर में लेखकों-शायरों की महफ़िलों में उठना-बैठना शुरू हुआ तो मैं भी उन्हें अपना लिखा सुनाने लगा। इसमें कोई शक़ नहीं कि मुझे उन ज़हीन हस्तियों के सोहबत में बहुत कुछ सीखने को मिला। लेकिन ये सिलसिला ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाया। उन्हीं दिनों मुल्क़ का बंटवारा हुआ और शरणार्थियों के क़ाफ़िले के साथ हम लोगों को लखनऊ चले आना पड़ा, जहां पिताजी के एक दोस्त का बेटा नौकरी करता था। उन्होंने लखनऊ में जमने में पिताजी की बहुत मदद की। पिताजी ने लखनऊ में एक वर्कशॉप खोली लेकिन घर के माली हालात बद से बदतर होते चले गए। घर में माता-पिता और मेरे अलावा दो छोटी बहनें भी थीं। ऐसे में मुझ पर दबाव पड़ने लगा कि मैं भी कमाना शुरू करूं। बहुत कोशिशों के बाद भी कोई काम नहीं मिला तो परेशान होकर एक रोज़ मैंने बिना किसी को बताए चुपचाप घर छोड़ दिया। ख़ाली हाथ और ख़ाली जेब लिए बिना टिकट मैं मुम्बई जाने वाली ट्रेन में सवार हो गया। उस वक़्त बस एक ही धुन सवार थी कि अपने पैरों पर खड़े होना है, लेकिन कैसे ये मुझे मालूम नहीं था। ये 1949 की गर्मियों का वाक़या है।

Naqsh ji in thoughts

मुम्बई में मेरे एक पत्र-मित्र प्रदीप नैयर रहते थे जिनसे मैं कभी मिला नहीं था। दोपहर के एक बजे ट्रेन से दादर स्टेशन पर उतरा। प्रदीप के, रहमत मंज़िल, दादर पूर्व के पते पर पहुंचा तो वहां ताला लटका मिला। पड़ोस की महिला ने बताया वो पूना गए हुए हैं और पन्द्रह दिनों बाद लौटेंगे। अब मैं भूखा-प्यासा, अजनबी शहर में अनजान लोगों के बीच पूरी तरह से सड़क पर था। लेकिन ये भी सच है कि एक रास्ता बंद होता है तो चार खुलते भी हैं। सामने से चले आ रहे एक बुज़ुर्ग सरदारजी से मैंने पूछा आसपास कोई सराय होगी, तो उन्होंने विस्तार से मेरी बात सुनकर मुझे माटुंगा में सिटीलाईट सिनेमा के पीछे गुरूद्वारे का पता देते हुए कहा, वहां जाओ, आठ दिन रहने की जगह मिलेगी और साथ में दोनों वक़्त का लंगर भी। पैदल घिसटता हुआ मैं क़रीब साढ़े चार बजे गुरूद्वारे पहुंचा तो लंगर ख़त्म हो चुका था। थका-हारा, वहीं फ़र्श पर लेट गया। पास ही में बिस्तर पर एक लड़का लेटा हुआ था। मेरी नज़र उसके सिरहाने रखी उर्दू पत्रिका नक़ूशपर पड़ी। पत्रिका के बहाने उनसे बातचीत शुरू हुई तो पता चला, उनका नाम कुलदीप सिंह है और वो भी लखनऊ के रहने वाले हैं। लखनऊ में लाटूश रोड पर उनकी मोटर-पार्ट्स की दुकान थी जिसकी ख़रीदारी के सिलसिले में वो मुम्बई आए थे। ये पता चलने पर कि मैं शायर हूं वो बहुत ख़ुश हुए। उन्होंने मुझे साफ़ लुंगी और साबुन दिया, मैं नहा-धोकर ग़ुसलखाने से बाहर निकला और फिर जो सोया तो नींद तभी खुली जब कुलदीप जी ने रात के लंगर के वक़्त मुझे ज़बर्दस्ती उठाया।

...तो ये था इस अजनबी शहर में मेरा पहला दिन !

At the Recording of Mumtaz Tujhe Dekha with Naushad, Uttam Singh and Hariharan

कुलदीप सिंह जी ने उन आठ दिनों में मेरी भरपूर मदद की। लखनऊ लौटने से पहले उन्होंने न सिर्फ गुरुद्वारे में मेरे ठहरने के इंतज़ाम को और एक हफ़्ते के लिए बढ़वाया बल्कि जाते वक़्त मुझे बीस रूपए भी दिए जो उस ज़माने में अच्छी-ख़ासी रक़म हुआ करती थी। उनके इस एहसान को मैं न तो कभी नहीं भूला हूं और न ही कभी भुला पाऊंगा। आगे चलकर भी हमारा सम्पर्क हमेशा बना रहा।

Recording of Allah Ke Nek Bande Sarfarosh

मुझे अगर कोई शौक़ था तो वो था पान खाने का, जिसने आगे चलकर मेरे लिए इस अजनबी शहर में एक अहम रास्ता खोला। दरअसल अपने शौक़ के चलते पान की दुक़ान पर मेरा आना-जाना लगा रहता था। उन दिनों गुरूद्वारे में मेरा रहने का वक़्त ख़त्म होने वाला था। तभी एक रोज़ पान की दुक़ान पर अचानक मेरी मुलाक़ात लाहौर के रहने वाले एक दोस्त दीपक आशा से हुई जो लाहौर में बनी फ़िल्म पराए बस में (1946) में खलनायक का किरदार निभा चुके थे। ये वोही दीपक आशा थे जिन्होंने आगे चलकर धरम कुमार के नाम से घमण्ड (1955), रोड नं.303 (1960), संगदिल (1967) और मर्डर ऑन हाईवे (1970) जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया था। दीपक मुझे अपने घर ले गए और इस तरह इस शहर में कुछ वक़्त के लिए मेरा रहने का इंतज़ाम भी हो गया। धीरे-धीरे दोस्ती का मेरा दायरा बढ़ने लगा। उन्हीं दिनों डाकतार विभाग में नौकरी मिली तो ज़िंदगी सुचारू रूप से चलने लगी। लेकिन साल भर के अंदर ही नौकरी से ऊब होने लगी तो इस्तीफ़ा दे दिया। फिर हम कुछ दोस्तों ने मिलकर एक नाटक तैयार किया जिसमें मशहूर अभिनेता राममोहन भी एक रोल करने वाले थे, जो उन दिनों जगदीश सेठी के निर्देशन में बन रही फ़िल्म जग्गू में भी बतौर सहायक-निर्देशक काम कर रहे थे। मेरे लिखे नाटक और उसके गीतों से राममोहन इतने प्रभावित थे कि उन्होंने मुझे जगदीश सेठी जी से मिलवाया। फ़िल्म जग्गू में हंसराज बहल के संगीत निर्देशन में पहले से ही सात गीतकार ट्रायल पर काम कर रहे थे, जिनमें से भरत व्यास, वर्मा मलिक और असद भोपाली के अलावा मुझे भी चुन लिया गया। उस फ़िल्म में मैंने एक कैबरे गीत लिखा था, मैं तेरी हूं तू मेरा है दिल लेता जा, जिसे कुलदीप कौर पर फ़िल्माया गया था। इस तरह साल 1952 में बनी फ़िल्म जग्गू से बतौर गीतकार मेरे करियर का श्रीगणेश हुआ।

Recording of Rasm-e-Ulfat Ko

उर्दू शायरी में चूंकि हमेशा से उपनाम के आगे शहर का नाम लगाने का चलन रहा है इसलिए मैं लाहौर में ही जसवंतराय शर्मा से नक़्श लायलपुरी हो चुका था। उधर लखनऊ में घरवालों को भी पता चल चुका था कि मैं मुम्बई में हूं और हमारे बीच फिर से सम्पर्क स्थापित हो चुका था, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं फ़िल्मों में काम करने लगा हूं, उन्होंने मुझसे संबंध तोड़ दिए। उधर फ़िल्म जग्गू के रिलीज़ होने के बाद भी मेरा संघर्ष जारी रहा। उसी दौरान लखनऊ के एक दोस्त ने पत्र के ज़रिए अपनी बहन का रिश्ता मेरे लिए भेजा जिसके जवाब में मैंने उसे लिखा कि मैंने ज़िंदगी में हरेक काम अपने पैरों पर खड़ा होकर करने की कोशिश की है लेकिन शादी मैं अपने मां-बाप की मरज़ी से करूंगा। उसने मेरा पत्र मेरे पिताजी को दिखाया तो उन्हें बेहद ख़ुशी हुई। पिताजी ने वो पत्र बेहद गर्व से अपने उन सभी दोस्तों को दिखाया जो कहते थे कि उनका बेटा उनके कहे में नहीं है। इस तरह साल 1953 में मेरी शादी हुई और घरवालों के साथ मेरे संबंध सामान्य हो गए।

Seene Mein Toofan Recording with Naushad, Hariharan and Preeti Uttam

मेरी ज़िम्मेदारियां बढ़ रही थीं। संघर्ष बदस्तूर जारी था। दिन बेहद परेशानियों में ग़ुज़र रहे थे। मेरी उर्दू इतनी नफ़ीस थी कि लोग मुझे पंजाबी मानने को तैयार ही नहीं होते थे। इसके बावजूद एक रोज़ सपन-जगमोहन ने मुझे एक सौ एक रूपए एडवांस देकर पंजाबी फ़िल्म में गीत लिखने को कहा। मैं ठहरा उर्दू का शायर, आत्मविश्वास था नहीं लेकिन पैसे की सख़्त ज़रूरत के चलते रात भर जागकर सोलह गीतों के मुखड़े लिख डाले। पत्नी को हिदायत दी कि पैसा ख़र्च न करें, शायद वापस करने पड़ें। सुबह होते ही सपन-जगमोहन से मिला तो गीत सुनते ही वो उछल पड़े। वो फ़िल्म थी 1953 में बनी जीजाजी जो इतनी जबर्दस्त हिट हुई कि मेरे सामने पंजाबी फ़िल्मों की लाईन लग गयी।

With Sanjeev Kumar at Recording of Shaayar To Nahi Hoon (Insaf ka mandir) for composers Sapan Jagmohan

जीजाजी के बाद मैंने सपन-जगमोहन, हरबंस, एस.मदन, दत्ताराम, बी.एन.बाली, राज सोनी, सुरिंदर कोहली, हंसराज बहल, जगजीत कौर, वेद सेठी, बाबुल, हुस्नलाल-भगतराम, ख़ैयाम, चित्रगुप्त, मोहिंदरजीत सिंह, मास्टर अल्लारक्खा और कुलदीप सिंह जैसे संगीतकारों के लिए एह धरती पंजाब दी, पौबारा, धरती वीरां दी, सत सालियां, लाईए तोड़ निभाईये, सतगुरू तेरी ओट, कुवांरा मामा, नीम हक़ीम, सपनी, जगवाला मेला, मां दी गोद, पटोला, तकरार, मढ़ी दा दीवा और वतनां तौं दूर जैसी करीब चालीस फ़िल्मों में गीत लिखे। मेरा आर्थिक संघर्ष तो कुछ हद तक ख़त्म हो चुका था लेकिन डर था कि कहीं पंजाबी फ़िल्मों का ही गीतकार बनकर न रह जाऊं।

Award Received By Naqsh ji

भले ही मैंने जग्गू जैसी सामाजिक फ़िल्म से अपने करियर की शुरूआत की थी लेकिन हिंदी फ़िल्मों के जो भी गिने-चुने प्रस्ताव मेरे पास आ रहे थे वो सभी सी-ग्रेड स्टण्ट फ़िल्मों के थे, जिन्हें मैं लगातार ठुकराता जा रहा था। ऐसे में एक रोज़ तंग आकर पत्नी ने मुझसे कहा, एक तो वो लोग होते हैं जिन्हें काम ही नहीं आता, दूसरे वो, जिन्हें काम तो आता है, लेकिन मिलता नहीं, और तीसरे आप जैसे जिन्हें काम आता भी है, मिलता भी है लेकिन आप करना ही नहीं चाहते। उनकी बात से मुझे झटका लगा और मैंने बग़ैर फ़िल्म का स्तर देखे, हिंदी फ़िल्मों में भी लिखना शुरू कर दिया। उस दौर में मैंने घमण्ड(1955), राईफ़ल गर्ल(1958), सर्कस-क्वीन(1959), चोरों की बारात(1960), रोड नं. 303(1960), ब्लैक शैडो(1961), ज़िंबो फ़ाईण्ड्स ए सन(1966), नौजवान(1966), संगदिल(1967) और जालसाज़(1969) जैसी कई स्टण्ट फ़िल्मों में गुलशन सूफ़ी, हरबंस, शफ़ी एम.नागरी, मनोहर, सी.अर्जुन, सपन जगमोहन और जी.एस.कोहली जैसे संगीतकारों के साथ काम किया। इनमें से फ़िल्म चोरों की बारातके निर्देशक मेरे वोही पत्रमित्र प्रदीप नैयर थे, जिनके दादर स्थित घर पर मुम्बई में मैं सबसे पहले पहुंचा था और जहां मुझे ताला लटका मिला था। इस फ़िल्म में कुल पांच गीतकारों में मेरे साथ फ़ारूख़, ग़ाज़ी और साजन बिहारी के अलावा ग़ुलज़ार दीनवी नाम के भी एक गीतकार थे जिन्हें आज गुलज़ार के नाम से जाना जाता है। फ़िल्म चोरों की बारातके कुल छह गीतों में से मैंने एक गीत ले मार हाथ पे हाथ गोरिए कर ले पक्की बात लिखा था तो गुलज़ार दीनवी का लिखा गीत था, ये दुनिया है ताश के पत्ते इसको करो सलाम। फ़िल्म रोड नं.303 से संगीतकार सी.अर्जुन ने अपना करियर शुरू किया था तो राईफ़ल गर्ल और ब्लैक शैडोजैसी फ़िल्मों के संगीतकार हरबंस को संगीतकार पण्डित अमरनाथ के बेटे के तौर पर कहीं ज़्यादा जाना जाता था। हरबंस की तीन फ़िल्मों मैंने शाद के नाम से गीत लिखे थे। उधर पंजाबी फ़िल्मों का गीतकार होने की मेरी पहचान इतनी गहरी जड़ें जमाए हुए थी कि रवि के संगीत में साहिर लुधियानवी का लिखा फ़िल्म प्यार का बंधन का गीत घोड़ा पिशौरी मेरा, तांगा लाहौरी मेरा आकाशवाणी पर काफ़ी वक़्त तक सिर्फ इसलिए मेरे नाम से बजता रहा क्योंकि उसमें पंजाबी के अल्फ़ाज़ की भरमार थी। और शायद इसी वजह से रोशन के संगीत में फ़िल्म मधु (1959) के मेरे लिखे गीत धानी चुनर मोरी हाए रे, जाने कहां उड़ी जाए रे का श्रेय काफ़ी समय तक शैलेन्द्र को मिलता रहा।

Naqsh ji Being Facilitated by Dharmendra

मैंने चालीस पंजाबी फ़िल्मों में क़रीब साढ़े तीन सौ गीत लिखे होंगे। साथ ही कैप्टन शेरू, सरफ़रोश, तेरी तलाश में, पुरानी पहचान, ग़ुस्ताख़ी माफ़, गुनाह और कानून जैसी हिंदी फ़िल्मों में भी गीत लिखता रहा। लेकिन मुझे सही पहचान मिली 1970 में आयी फ़िल्म चेतना से। इस फ़िल्म में मेरा लिखा और मुकेश का गाया गीत मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा आज भी उतने ही चाव से सुना जाता है। उसके बाद मुझे मदन मोहन, जयदेव, ख़ैयाम, रवींद्र जैन, नौशाद, शंकर जयकिशन सहित उस दौर के सभी नामी संगीतकारों के साथ काम करने का मौक़ा मिला। रस्मे उल्फत को निभाएं कैसे (दिल की राहें), कई सदियों से कई जन्मों से (मिलाप), उल्फत में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ (कॉलगर्ल), तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे(तुम्हारे लिए), ये मुलाक़ात इक बहाना है(ख़ानदान), माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं(आहिस्ता आहिस्ता), चांदनी रात में हर बार तुम्हें देखा है (दिले नादान), तुम्हें हो न हो मुझको तो इतना यक़ीं है (घरौंदा), कदर तूने ना जानी (नूरी), न जाने क्या हुआऔर प्यार का दर्द है (दर्द), चिट्ठिए (हिना) और मुमताज़ तुझे देखा (ताजमहल) जैसे मेरे लिखे कई गीत अपने दौर में बेहद मशहूर हुए।

Naqsh ji at Award Function

टी.वी. सीरियलों का दौर आया तो मुझे कई सीरियलों के शीर्षक गीत लिखने का मौक़ा भी मिला। इंतज़ार और सही, शिकवा, दरार, अधिकार, वारिस, कर्तव्य, अभिमान, मिलन, सुकन्या, अनकही, सवेरा, चुनौती, विरासत, आशियाना, बाज़ार, गृहदाह, श्रीकांत, मुजरिम हाज़िर है, अमानत, कैम्पस, किटी पार्टी, दहलीज़, मुल्क़, ये इश्क़ नहीं आसान, सरहदें, विक्रम वेताल, सवेरा और बिखरी आस निखरी प्रीत जैसे दूरदर्शन और निजी चैनलों के कई सीरियलों के शीर्षक गीत मैंने लिखे।

Naqsh ji with Singer Lata Mangeshkar During Recording Of Ulfat Mein Zamane Ki

साल 2006 में आयी फ़िल्म यात्रा में मैंने ख़ैयाम के संगीत में एक गज़ल साज़-ए-दिल नगमा-ए-जां लिखी थी जिसे तलत अज़ीज़ ने गाया था। फ़िल्म यात्रा को मेरी अभी तक की आख़िरी फ़िल्म कहा जा सकता है, हालांकि हाल ही में मैंने संगीतकार ग़नीअली की प्राईवेट अलबम के अलावा एक बाल-फ़िल्म ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार के लिए गीत लिखे हैं।

Naqsh ji being Felicitated By Dev Anand

क़रीब साठ बरसों के करियर के दौरान मैंने तकरीबन सभी नामी-गिरामी संगीतकारों के साथ काम नेकिया है। इस दौरान मैंने दो सौ से भी ज़्यादा फ़िल्मों में क़रीब बारह सौ गीत लिखे होंगे। बीते 24 फरवरी को तिरासी साल का हो चुका हूं। परिवार में पत्नी और तीन बेटे हैं, बड़ा और छोटा बेटा निजी क्षेत्र की कम्पनियों में मैनेजर हैं। सिर्फ़ मंझले बेटे राजन लायलपुरी ने ही सिनेमा को व्यवसाय के तौर पर चुना है और वो सिनेमैटोग्राफ़र होने के साथ-साथ एक लेखक भी हैं। पंजाबी फ़िल्म वतनां तौं दूरउन्हीं की कहानी पर बनी है।

Naqsh ji being felicitated by Sunil Dutt

बीती 12 जनवरी को मोरारी बापू की रामकथा संस्था ने एक समारोह में मुझे लाईफटाईम अचीवमेण्ट अवॉर्ड से नवाज़ा था। आज भरेपूरे परिवार में ज़िंदगी शांति से ग़ुज़र रही है। पीछे मुड़कर देखता हूं तो उतार-चढ़ाव से भरे अपने सफर को मंज़िल पर पहुंचा देख मन को संतोष होता है और ख़ासतौर से पत्नी के प्रति मन श्रद्धा से भर उठता है जिन्होंने हर अच्छे-बुरे वक़्त में मेरा पूरा साथ दिया है।

 

 

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नक़्श साहब के कुछ मशहूर गीत (वीडियो) :

  1. 1.धानी चुनर मोरी हाए रे http://youtu.be/p86bNXMmwJA
  2. 2.मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदाhttp://youtu.be/eHevQ9XGsCI
  3. 3.कई सदियों से कई जन्मों से http://youtu.be/Ss2Bh78sHB8
  4. 4.उल्फ़त में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओhttp://youtu.be/bqWFvBSkl5E
  5. 5.तुम्हें देखती हूं तो लगता है ऐसे http://youtu.be/9imljtd9QAQ
  6. 6.ये मुलाक़ात इक बहाना हैhttp://youtu.be/w2HJR_T2NFA
  7. 7.क़दर तूने ना जानी http://youtu.be/-nIUXECWWEw
  8. 8.चांदनी रात में एक बार तुझे देखा हैhttp://youtu.be/nD26-e5T0Rs
  9. 9.चिट्ठिएhttp://youtu.be/SvOznLuyw4Y
  10. 10.तुम्हें हो न हो मुझको तो http://youtu.be/oiuvzMiOw2g
  11. 11.प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्याराhttp://youtu.be/yz0sYTgmxVA
  12. 12.सीने में भी तूफ़ां है http://youtu.be/SaBGa4UipuU

 

नक़्श साहब के कुछ मशहूर गीत (ऑडियो) :

  1. 1.http://ww.smashits.com/naqsh-lyallpuri/songs/lyricist-8233-page-1.html
  2. 2.http://ww.smashits.com/naqsh-lyallpuri/songs/lyricist-8233-page-2.html
  3. 3.http://ww.smashits.com/naqsh-lyallpuri/songs/lyricist-8233-page-3.html
  4. 4.http://ww.smashits.com/naqsh-lyallpuri/songs/lyricist-8233-page-4.html
  5. 5.http://ww.smashits.com/naqsh-lyallpuri/songs/lyricist-8233-page-5.html
  6. 6.http://ww.smashits.com/naqsh-lyallpuri/songs/lyricist-8233-page-6.html
  7. 7.http://ww.smashits.com/naqsh-lyallpuri/songs/lyricist-8233-page-7.html

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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