Uma Devi (Tuntun) in Interview with Shishir Krishna Sharma

Written by shishir krishna sharma
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                           उमादेवी ( टुनटुन )

                                    .................शिशिर कृष्ण शर्मा

 

हिन्दी सिनेमा के क्षेत्र में पहला कदम उन्होंने एक गायिका के रूप में रखा था. उनके पहले ही गीत ने क़ामयाबी की तमाम बुलन्दियां पार कीं. लेकिन बामुश्क़िल 40-45 गीत गाने के बाद घरेलू वजहों से उन्हें फिल्मोद्योग से अलग हो जाना पड़ा. फिर कुछ ही समय बाद पैसे की मजबूरी उन्हें वापस इस चमक-दमक भरी दुनिया में खींच लाई. लेकिन तब तक प्लेबैक के क्षेत्र का दृश्य इतना बदल चुका था कि उन्हें बतौर गायिका काम मिलना आसान नहीं रह गया था. मजबूरन उन्हें पैसा कमाने के लिए कैमरे के सामने आना पड़ा. ये था नियति का खेल ! अभिनेत्री टुनटुन बनकर उन्होंने जो लोकप्रियता हासिल की वैसी लोकप्रियता गायिका उमादेवी के रूप में उन्हें शायद ही मिल पाती. पचास और साठ के दशक की हिन्दी फिल्मों के दर्शक गवाह हैं इस बात के कि टुनटुन वो एकमात्र महिला कॉमेडियन थीं जिनके परदे पर आने मात्र से सिनेमाहॉल में ठहाके गूंजने लगते थे. उनकी लोकप्रियता का आलम कुछ ऐसा था कि उस दौर में वो हर दूसरी-तीसरी फिल्म में नज़र आती थीं, भले ही उनकी भूमिका नगण्य सी और एक-दो दृश्यों की ही क्यों न हो. अक्सर कहा जाता है कि कोई ज़रूरी नहीं कि एक अभिनेता की परदे पर नज़र आने वाली छवि उसकी असल ज़िंदगी से मेल खाए. काफी हद तक ये बात सच भी है. लेकिन टुनटुन इसकी अपवाद थीं. वो असल ज़िन्दगी में भी उतनी ही मस्तमौला और हंसने-हंसाने वाली महिला थीं जितनी कि फिल्म के परदे पर नज़र आती थीं. लेकिन ये उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू था.

Uma Devi with Shishir ji During The Interview

मेरी पीढ़ी के होश सम्भालने तक भारतीय सिनेमा लगभग पूरी तरह से रंगीन हो चला था. इसके बावजूद ब्लैक एण्ड व्हाईट सिनेमा का दौर मुझे हमेशा ही रंगीन सिनेमा के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा आकर्षित करता रहा और आज भी करता है. साफ-सुथरी सोद्देश्य फिल्में, उन फिल्मों का कर्णप्रिय गीत-संगीत, मंझे हुए अभिनेता-अभिनेत्रियां, गुणी लेखक-गीतकार-संगीतकार, उत्कृष्ट भाषा और भारतीयता से ओत-प्रोत सादगी जैसी विशेषताओं की वजह से ही वो दौर हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल कहलाता है. पत्र-पत्रिकाओं में छपे उस स्वर्णकाल से सम्बन्धित आलेख, फोटोज़ और फिल्मोग्राफियों का संग्रह करना, देर रात तक जागकर रेडियो पर उस दौर के गीत सुनना और अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद उन फिल्मों के एल.पी., ई.पी., एस.पी. रेकॉर्ड खरीदना मेरे लिए एक नशा सा बन चुका था. क़रीब पन्द्रह साल पहले मुम्बई आया तो सोचा भी नहीं था कि मेरा ये नशा मेरे लिए अवसरों के नए दरवाज़े खोल देगा. अग्रज सरीखे मित्र और मशहूर लेखक और पत्रकार धीरेन्द्र अस्थाना को मेरे भीतर छुपा वो लेखक नज़र आया जिसका पता तब तक मुझे भी नहीं था. उस लेखक को बढ़ावा देते हुए धीरेन्द्र जी ने जनसत्ता सबरंग, जागरण सखी और जागरण उदय जैसी हर उस पत्रिका में कहानी-लेख आदि लिखने के लिए प्रेरित किया जिससे समय के साथ-साथ वो जुड़ते गए. हिन्दी सिनेमा के सुनहरी दौर से मेरे भावनात्मक जुड़ाव से भी वो अच्छी तरह वाक़िफ थे. इसलिए ‘सहारा समय’ के प्रकाशन के समय मुम्बई ब्यूरो-प्रमुख की कुर्सी सम्भालते ही उन्होंने उस हिन्दी साप्ताहिक पत्र का एक समूचा पेज मेरे नाम कर दिया. फिल्म पहेली और स्तम्भ ‘बाकलम खुद’ के अलावा उस पेज पर स्तम्भ ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ से मेरे विधिवत लेखन की शुरुआत हुई. सुनहरी दौर के, समय के साथ गुमनामी में खो चुके मशहूर लोगों के बारे में जानने की उत्सुकता तो मन में हमेशा से थी ही, अब मेरे पास एक मक़सद भी था सो मैं जुट पड़ा उन खोए हुए कलाकारों की तलाश में. श्यामा, शशिकला, शारदा, महिपाल, जॉय मुकर्जी, राजेन्द्रनाथ, अनिता गुहा, दुलारी, पूर्णिमा, सुधा मल्होत्रा...ऐसे नामों की सूची अंतहीन थी. वयोवृद्ध अभिनेता चन्द्रशेखरजी और ‘सिने एण्ड टी.वी.आर्टिस्ट एसोसिएशन’ के ऑफिस में कार्यरत अनिल गणपत गायकवाड़ और सुखदेव बापू जाधव ने इस मुहिम में मेरी भरपूर मदद की. जहां एक ओर चन्द्रशेखरजी ने ऐसे कई भूले-बिसरे कलाकारों के नाम मुझे सुझाए, वहीं अनिल और सुखदेव एसोसिएशन के रेकॉर्ड में से ढूंढकर लगातार मुझे उनके पते और फोन नम्बर देते रहे. टुनटुन उन कलाकारों में से थीं जिनके मौजूदा हालात जानने के लिए मैं हमेशा से बेताब था. उनका इण्टरव्यू मैं ‘सहारा समय’ के प्रकाशन की शुरुआत में ही कर चुका होता अगर मेरे पास उनका सही पता होता. एसोसिएशन के रजिस्टर में दर्ज उनके पते पर मैं अंधेरी (पश्चिम) स्थित यारी रोड के इलाक़े में पहुंचा तो पता चला वो तो साल भर पहले ही अपना फ्लैट बेचकर जा चुकी थीं. कहां गयीं, ये किसी को नहीं पता था. सिने एण्ड टी.वी.आर्टिस्ट एसोसिएशन से भी उन्होंने लम्बे समय से सम्पर्क नहीं किया था.

Uma Devi (Tuntun) at her Home

क़रीब चार-पांच महिने बाद अचानक अनिल ने मुझे फोन किया. बेहद उत्साहित स्वर में अनिल ने बताया कि अभी-अभी टुनटुनजी का फोन आया था, अब वो बान्द्रा-विलेज में अपनी छोटी बेटी के साथ रहती हैं और उन्होंने जल्द ही होने जा रही एसोसिएशन की सालाना जनरल बॉडी मीटिंग में हिस्सा लेने का वादा किया है. मैं तय समय पर उस मीटिंग में पहुंचा. टुनटुन को बेहद सम्मान के साथ मंच पर बैठाया गया था. दुबली-पतली वृद्धा को सामने देखते ही उनकी वो छवि भरभराकर ढह पड़ी जिसे मैं अभी तक सिनेमा के परदे पर देखता आया था. मंच पर मौजूद दिलीप साहब, चन्द्रशेखरजी, धर्मेन्द्र, अमरीश पुरी और दारासिंह जैसे वरिष्ठ कलाकारों को उनके साथ बेहद अदब से पेश आते देखा. इतनी उम्र हो जाने के बावजूद टुनटुन की चुहलबाज़ी, गर्मजोशी और चुटीली बातों में कोई कमी नहीं आई थी. मौक़ा देखकर मैं उनसे मिला और अपना परिचय देते हुए उनका इण्टरव्यू करने की इच्छा ज़ाहिर की तो वे तुरन्त तैयार हो गईं.

तय समय के अनुसार 27 अक्टूबर 2003 की शाम ठीक 6 बजे मैं अपने फोटोग्राफर साथी अनिल मुरारका के साथ टुनटुन के बान्द्रा पश्चिम स्थित घर पर पहुंचा. मस्तमौला स्वभाव्, चुटीली बातें, बात-बात पर हंसना-हंसाना भले ही उनके व्यक्तित्व का जगज़ाहिर पहलू था लेकिन वास्तव में उसके पीछे अथाह दर्द छुपा हुआ था. ज़िन्दगी में उन्होंने शायद ही कभी कोई सुख देखा हो. उनका ये एक रेकॉर्डेड इण्टरव्यू था जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है. लीजिए पेश है टुनटुन की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी -  

‘मुझे याद नहीं कि मेरे माता-पिता कौन थे और कैसे दिखते थे. मैं दो-ढाई बरस की रही होंगी जब वो ग़ुज़रे थे. घर में मुझसे आठ-नौ साल बड़ा एक भाई था जिसका नाम हरि था. मुझे बस इतना याद था कि हम लोग अलीपुर नाम के गांव में रहते थे. गांव के बीच में एक तालाब था जिसमें बत्तखें तैरती रहती थीं. मेरा भाई गांव की रामलीला में भाग लेता था. एक रोज़ मैं किसी घर की छत पर बैठी रामलीला देख रही थी कि मुझे नींद आ गयी और मैं लुढ़ककर नीचे गिर पड़ी. भाई मेरा इतना ख्याल रखता था कि वो रामलीला के बीच में ही मंच छोड़कर मुझे उठाने के लिए दौड़ पड़ा था. उस वक़्त मैं तीन-चार बरस की और भाई बारह-तेरह बरस का रहा होगा. लेकिन एक रोज़ भाई भी ग़ुज़र गया और दो वक़्त की रोटी के एवज़ में रिश्तेदारों के लिए चौबीस घण्टे की नौकरानी छोड़ गया. अब रिश्तेदारी-बिरादरी में जहां कहीं भी शादी-ब्याह-जीना-मरना हो काम के लिए मुझे भेजा जाने लगा. मेरा अन्दाज़ है कि अलीपुर शायद दिल्ली के आसपास था क्योंकि अक्सर घरेलू काम के सिलसिले में मुझे दिल्ली के दरियागंज इलाक़े में किसी रिश्तेदार के घर आते-जाते रहना पड़ता था. उसी दौरान एक रोज़ पड़ोसियों से पता चला था कि अलीपुर में हमारी काफी ज़मीनें थीं जिन्हें हड़पने के लिए पहले मेरे माता-पिता और फिर भाई का क़त्ल कर दिया गया था.

गाने का शौक़ मुझे बचपन से था लेकिन गुनगुनाते हुए भी डर लगता था क्योंकि उन लोगों में से अगर कोई गाते हुए सुन लेता था तो मार पड़ती थी. उन्हीं दिनों दिल्ली में मेरी मुलाक़ात एक्साईज़ विभाग में इंस्पेक्टर अख्तर अब्बास काज़ी से हुई. उन्होंने मुझे सहारा दिया तो मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा. लेकिन तभी मुल्क़ का बंटवारा हुआ और काज़ी साहब लाहौर चले गए. इधर हालात से तंग आकर फिल्मों में गाने का ख्वाब लिए मैं एक रोज़ चुपचाप मुम्बई भाग आयी. दिल्ली में किसी ने निर्देशक नितिन बोस के असिस्टेण्ट जव्वाद हुसैन का पता दिया था सो उनसे आकर मिली और उन्होंने मुझे अपने यहां पनाह दे दी. उस वक़्त मेरी उम्र चौदह बरस की थी. उधर काज़ी साहब का मन लाहौर में नहीं लगा इसलिए मौक़ा पाते ही वो भी मुम्बई चले आए और फिर हमने शादी कर ली. ये सन 1947 का वाक़या है.

Uma Devi (Tuntun) in a Film

मैं काम की तलाश में थी. कारदार उन दिनों फिल्म ‘दर्द’ बना रहे थे. एक रोज़ उनके स्टूडियो में पहुंची और बेरोकटोक उनके कमरे में घुसकर बेझिझक उन्हीं से पूछ बैठी, कारदार कहां मिलेंगे, मुझे गाना गाना है. दरअसल मैं न तो कारदार को पहचानती थी और न ही फिल्मी तौर-तरीक़ों से वाक़िफ थी. शायद मेरा यही बेतक़ल्लुफी भरा अंदाज़ कारदार को पसन्द आया जो बिना नानुकुर किए उन्होंने नौशाद साहब के असिस्टेण्ट ग़ुलाम मोहम्मद को बुलाया और मेरा टेस्ट लेने को कहा. ग़ुलाम मोहम्मद ढोलक लेकर बैठे तो मैंने उनसे ठीक से बजाने को कहा. मेरे बेलाग तरीकों से वो भी हक्के-बक्के थे. बहरहाल मैंने फिल्म ‘ज़ीनत’ का नूरजहां का गाया गीत ‘आंधियां ग़म की यूं चलीं’ गाकर सुनाया जो सबको इतना पसन्द आया कि मुझे पांच सौ रुपए महिने की नौकरी पर रख लिया गया.      

पहला गीत जो मेरी आवाज़ में रेकॉर्ड हुआ था वो था साल 1947 में बनी फिल्म ‘दर्द’ का ‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेक़रार का’. ये गीत इतना बड़ा हिट साबित हुआ कि मुझे आज तक इसी गीत से पहचाना जाता है. इस फिल्म में मेरे गाए बाक़ी तीनों गीत ‘आज मची है धूम’, ये कौन चला’ और सुरैया के साथ ‘बेताब है दिल’ भी काफी पसन्द किए गए. उसी साल बनी फिल्म ‘नाटक’ में मैंने गीत ‘दिलवाले, जल कर ही मर जाना’ गाया. साल 1948 में बनी फिल्म ‘अनोखी अदा’ में मेरे दो सोलो गीत ‘काहे जिया डोले हो कहा नहीं जाए’ और ‘दिल को लगा के हमने कुछ भी न पाया’ थे. 1948 में प्रदर्शित हुई ‘चांदनी रात’ में मुझे उस फिल्म का शीर्षक गीत ‘चांदनी रात है, हाए क्या बात है’ गाने का मौक़ा मिला था. उसी साल बनी फिल्म ‘दुलारी’ में मैंने शमशाद बेगम के साथ मिलकर गाया था, ‘मेरी प्यारी पतंग चली बादल के संग’. इन सभी फिल्मों के संगीतकार नौशाद साहब थे. इसके अलावा मैंने ‘चन्द्रलेखा’, ‘हीर रांझा’ (दोनों 1948), ‘भिखारी’, ‘भक्त पुण्डलिक’, ‘प्यार की रात, ‘सुमित्रा’, ‘रूपलेखा’, ‘जियो राजा’, ‘हमारी किस्मत’ (सभी 1949), ‘भगवान श्री कृष्ण’ (1950), ‘सौदामिनी’ (1950), ‘दीपक’ (1951), ‘जंगल का जवाहर’ (1952) और ‘राजमहल’ (1953) जैसी फिल्मों में भी गीत गाए. चूंकि संगीत और गायन की मैंने विधिवत शिक्षा नहीं ली थी और उधर बच्चों के जन्म के साथ घरेलू ज़िम्मेदारियां भी बढ़ने लगी थीं इसलिए बतौर गायिका मेरा करियर ज़्यादा नहीं चल पाया. मेरे गाए गीतों की कुल संख्या क़रीब 45 होगी. यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहूंगी कि मुझे सिंदूर खिलाकर मेरी आवाज़ खराब कर देने वाली जो बात अक्सर कही-सुनी जाती है, वो महज़ अफवाह है. उसमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है.

Uma Devi (Tuntun) Acting

कुछ समय मैं फिल्मों से दूर रहकर अपने परिवार में उलझी रही. पति नौकरी करते थे लेकिन परिवार बढ़ने के साथ उनका वेतन कम पड़ने लगा तो मजबूरन मुझे एक बार फिर से काम की तलाश में निकलना पड़ा. मैं नौशाद साहब से मिली जो उन दिनों फिल्म ‘बाबुल’ बना रहे थे. उन्होंने मुझे उस फिल्म में एक हास्य भूमिका करने को कहा जिसे मैंने स्वीकार कर लिया. हालांकि इससे पहले फिल्म ‘दर्द’ में भी वो मुझे एक भूमिका ऑफर कर चुके थे लेकिन तब मैं अभिनय के लिए मानसिक तौर पर तैयार नहीं थी. उमादेवी की जगह टुनटुन नाम भी मुझे फिल्म ‘बाबुल’ में नौशाद साहब ने ही दिया था. आगे चलकर यही नाम मेरी पहचान बन गया. मेरा ये रूप दर्शकों को बेहद पसन्द आया और देखते ही देखते मैं हिन्दी फिल्मों की अतिव्यस्त हास्य अभिनेत्री बन गयी. फिर तो उड़न खटोला, बाज़, आरपार, मिस कोकाकोला, मिस्टर एण्ड मिसेज़ 55, राजहठ, बेगुनाह, उजाला, कोहिनूर, नया अंदाज़, 12 ओ’क्लॉक, दिल अपना और प्रीत पराई, कभी अन्धेरा कभी उजाला, मुजरिम, जाली नोट, एक फूल चार काण्टे, काश्मीर की कली, अक़लमन्द, सी.आई.डी.909, दिल और मोहब्बत, एक बार मुस्कुरा दो और अन्दाज़ जैसी सैकड़ों फिल्में मैंने कीं. सत्तर के दशक में मेरी सक्रियता में कमी आनी शुरु हुई और फिर क़ुर्बानी और नमक हलाल जैसी फिल्में करने के बाद मैंने खुद को अभिनय से दूर कर लिया. नब्बे के दशक की शुरुआत में काज़ी गुज़रे. अब दोनों बेटों और दोनों बेटियों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद पिछले क़रीब बीस बरस से मैं घर पर ही रहकर आराम कर रही हूं.’

दिनांक 22 नवम्बर 2003 के सहारा समय में छपा टुनटुन का ये इण्टरव्यू उनका आखिरी इण्टरव्यू साबित हुआ. मैंने उन्हें फोन करके बताया कि अखबार की प्रति मैं उन्हें कुरियर से भिजवा रहा हूं. इस पर उन्होंने अपनी चिरपरिचित स्टाईल में कहा, ‘ओए शर्मे-बेशर्मे, अखबार कुरियर से भेज रहा है तो फिर इण्टरव्यू भी फोन पर ही ले लेना था’. क़रीब आधा घण्टे के बाद उन्होंने फोन तब बन्द किया जब मैंने उनसे वादा नहीं कर लिया कि मैं दो-तीन दिन में ही उनसे मिलने आऊंगा. लेकिन मुझे इस बात का अफसोस हमेशा रहेगा कि मैं अपना वादा नहीं निभा पाया. वो अपना ये आखिरी इण्टरव्यू भी नहीं पढ़ पायीं क्योंकि अगली ही सुबह उनकी तबीयत बिगड़ी, उन्हें बान्द्रा के एक निजी अस्पताल में भरती कराया गया, जहां 24 नवम्बर 2003 की सुबह उनका देहांत हो गया.

टुनटुन को हमसे बिछुड़े आज सात बरस बीत चुके हैं. लेकिन जब कभी हिन्दी सिनेमा की महिला हास्य-कलाकारों की बात होगी, उनका नाम उस सूची में सर्वोपरि होगा. और उनका गाया ये सदाबहार गीत भी सुनने वालों को हमेशा लुभाता रहेगा – ‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेक़रार का......!’     

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